तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह और पार्टी पर अधिकार को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक चरण की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के गुटों ने दिल्ली में चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के सामने अपनी-अपनी दलीलें रखीं। दोनों पक्षों ने पार्टी पर अपने अधिकार के समर्थन में दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।
सुनवाई के बाद चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी को 16 सितंबर दोपहर 3 बजे तक अतिरिक्त दस्तावेज या ऐसी कोई अन्य सामग्री जमा करने का समय दिया, जो पार्टी पर उनके दावे को मजबूत कर सकती है। आयोग ने यह भी निर्देश दिया कि ममता गुट की ओर से जमा किए जाने वाले दस्तावेजों की एक प्रति ऋतब्रत गुट को भी उपलब्ध कराई जाए।
16 सितंबर तक पेश करने होंगे अतिरिक्त सबूत
चुनाव आयोग की ओर से दिया गया समय इस विवाद में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ममता गुट के पास अब अपने दावे के समर्थन में अतिरिक्त दस्तावेज और दलीलें रखने का अवसर है। इसके बाद आयोग दोनों पक्षों के दावों और प्रस्तुत सामग्री के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय कर सकता है।
इस मामले में अभी चुनाव आयोग की ओर से कोई अंतरिम फैसला नहीं सुनाया गया है। इसलिए फिलहाल तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह को लेकर स्थिति यथावत बनी हुई है। आने वाले दिनों में आयोग के सामने पेश होने वाली दलीलें इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
कल्याण बनर्जी ने कहा- कोई अंतरिम आदेश नहीं
तृणमूल कांग्रेस के सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने चुनाव आयोग की कार्रवाई पर कहा कि आयोग ने अभी तक कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है। उनके मुताबिक दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया है और आगे की प्रक्रिया निर्धारित तारीखों के अनुसार चलेगी।
कल्याण बनर्जी ने यह भी कहा कि तृणमूल के उम्मीदवार आधिकारिक चुनाव चिन्ह पर ही उपचुनाव लड़ रहे हैं। उनके बयान का संकेत साफ है कि पार्टी फिलहाल अपने चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक अधिकार को लेकर किसी तत्काल बदलाव की स्थिति नहीं मान रही है।
कुणाल घोष का ऋतब्रत पर तीखा हमला
तृणमूल नेता कुणाल घोष ने मामले की कानूनी पेचीदगियों पर विस्तार से टिप्पणी करने से परहेज किया। उन्होंने कहा कि पार्टी की सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी और कल्याण बनर्जी इस मामले को देख रहे हैं। हालांकि, उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी पर तीखा राजनीतिक हमला जरूर किया।
कुणाल घोष ने आरोप लगाया कि ऋतब्रत बनर्जी उस पार्टी पर दावा कर रहे हैं जिसे ममता बनर्जी ने अपने संघर्ष और मेहनत से खड़ा किया। उन्होंने ममता के नेतृत्व और पार्टी निर्माण में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए ऋतब्रत गुट की दावेदारी पर सवाल उठाए।
ऋतब्रत बनर्जी बोले- यह सामान्य प्रक्रिया
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग की ओर से भेजे गए पत्र को सामान्य प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। उनके अनुसार आयोग ने दोनों पक्षों को अपनी दलीलें और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया है।
ऋतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपनी ओर से आवश्यक दस्तावेज जमा कर दिए हैं और आयोग ने दोनों पक्षों को 16 सितंबर तक अंतिम बातें रखने का समय दिया है। जरूरत पड़ने पर 17 सितंबर को दोबारा सुनवाई भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा, इसका फैसला न तो कोई नेता और न ही कोई राजनीतिक दल कर सकता है, बल्कि यह अधिकार चुनाव आयोग के पास है।
तृणमूल पर बीजेपी का हमला
इस विवाद को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने भी तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधा है। बंगाल की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो चुका है और पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही लड़ाई से जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता।
उन्होंने रेजीनगर और नंदीग्राम उपचुनावों का जिक्र करते हुए तृणमूल पर राजनीतिक हमला बोला। भाजपा का रुख साफ है कि पार्टी के भीतर चल रहा विवाद तृणमूल की संगठनात्मक कमजोरी को उजागर करता है और इसका असर आने वाले चुनावी मुकाबलों में दिखाई दे सकता है।
‘घास-फूल’ चिन्ह पर टिकी सबकी नजर
तृणमूल कांग्रेस की पहचान उसके ‘घास-फूल’ चुनाव चिन्ह से जुड़ी हुई है। ऐसे में पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार का विवाद केवल संगठनात्मक मामला नहीं, बल्कि सीधे तौर पर चुनावी राजनीति से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि चुनाव आयोग की सुनवाई पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में खास नजर बनी हुई है।
अब 16 सितंबर की समयसीमा और उसके बाद संभावित 17 सितंबर की सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज और तर्क पेश कर चुके हैं। ऐसे में आगे चुनाव आयोग किस निष्कर्ष पर पहुंचता है, यह तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य और चुनावी पहचान के लिहाज से बेहद अहम हो सकता है।
उपचुनावों पर भी पड़ सकता है असर
चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद ऐसे समय सामने आया है जब रेजीनगर और नंदीग्राम उपचुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। ऐसे में पार्टी के आधिकारिक चिन्ह और संगठनात्मक नियंत्रण से जुड़ा कोई भी फैसला सीधे तौर पर चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल आयोग ने कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है और तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार आधिकारिक चिन्ह के साथ चुनावी मैदान में हैं। इसलिए आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। 16 सितंबर तक दस्तावेज जमा होने और संभावित आगे की सुनवाई के बाद ही इस विवाद की अगली तस्वीर स्पष्ट होगी।