कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही बगावत अब कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ती दिख रही है। तृणमूल कांग्रेस छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हुए 20 बागी लोकसभा सांसदों की सदस्यता रद्द कराने के लिए ममता बनर्जी गुट सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अगले 7 से 10 दिनों के भीतर शीर्ष अदालत में याचिकाएं दाखिल की जा सकती हैं। TMC इन सांसदों के खिलाफ संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दलबदल रोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग करेगी। पार्टी का कहना है कि सांसदों का दूसरे दल में जाना और विलय का दावा कानूनी तौर पर चुनौती देने योग्य है। इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर राजनीतिक गलियारों की नजर रहेगी।
अभिषेक बनर्जी ने ओम बिरला से की मुलाकात
इससे पहले TMC के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर बागी सांसदों की अयोग्यता से जुड़ी लंबित याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने की मांग की थी। अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष के सामने पार्टी का पक्ष रखते हुए कहा कि मामले में तय कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक निर्देशों के तहत समयबद्ध निर्णय होना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया था कि यदि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से उचित समयसीमा में फैसला नहीं लिया जाता है, तो पार्टी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है। TMC का कहना है कि बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबे समय से लंबित है। पार्टी अब इस मामले को अदालत के जरिए आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इससे पहले भी अभिषेक बनर्जी इस मुद्दे को लेकर लोकसभा अध्यक्ष से संपर्क कर चुके हैं।
जून से ही चल रही है सदस्यता रद्द कराने की मांग
TMC ने बागी सांसदों की सदस्यता के मुद्दे पर जून में ही याचिकाएं दाखिल की थीं। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत 20 जुलाई को भी पार्टी ने इस मामले को प्रमुखता से उठाया। इसके बाद 26 जुलाई को अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के वरिष्ठ सांसदों सौगत रॉय, कीर्ति आजाद और प्रतिमा मंडल के साथ लोकसभा अध्यक्ष को औपचारिक पत्र सौंपा था। पत्र के जरिए बागी सांसदों के खिलाफ दलबदल रोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी। हालांकि, मानसून सत्र समाप्त होने तक इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं हो सका। अब TMC ने सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जल्द ही इस संबंध में कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
विधानसभा चुनाव के बाद TMC में हुई बगावत
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में TMC को मिली हार के बाद पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर असंतोष सामने आया। पार्टी के 28 लोकसभा सदस्यों में से 20 सांसदों ने अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ बगावती रुख अपनाया। इसके बाद कई वरिष्ठ सांसदों ने छोटे राजनीतिक दल NCPI में अपने गुट के विलय की घोषणा की। इनमें सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय और मिताली बाग समेत कई नाम शामिल बताए गए हैं। बागी सांसदों ने केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA को समर्थन देने का भी ऐलान किया। इस घटनाक्रम ने TMC के सामने बड़ा राजनीतिक और कानूनी संकट खड़ा कर दिया है। अब पार्टी बागी सांसदों की सदस्यता के मुद्दे को अदालत में चुनौती देने जा रही है।
10वीं अनुसूची को लेकर आमने-सामने दोनों पक्ष
बागी सांसदों का दावा है कि वे TMC के कुल 28 लोकसभा सदस्यों में से दो-तिहाई से अधिक हैं। इसी आधार पर वे संविधान की 10वीं अनुसूची में दिए गए विलय संबंधी प्रावधान के तहत दलबदल विरोधी कानून से संरक्षण का दावा कर रहे हैं। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला TMC गुट इस दावे की वैधता को चुनौती देने की तैयारी में है। पार्टी का तर्क है कि केवल सांसदों की ओर से एकतरफा विलय की घोषणा करने से अयोग्यता की कार्रवाई से बचाव नहीं हो सकता। अब विवाद का मुख्य केंद्र यही है कि NCPI में सांसदों का कथित विलय संविधान के प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं। इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई अहम मानी जा रही है। अदालत के फैसले का असर TMC की लोकसभा में संख्या और बंगाल की राजनीति पर भी पड़ सकता है।