कोलकाता: पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों में कलकत्ता हाईकोर्ट से मिली अंतरिम राहत को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार चाहती है कि हाईकोर्ट के उस आदेश में बदलाव किया जाए, जिसके तहत अभिषेक बनर्जी को 30 नवंबर 2026 तक गिरफ्तारी सहित कठोर पुलिस कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण मिला हुआ है।
राज्य सरकार ने शुक्रवार, 6 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। दीपावली की न्यायिक छुट्टियों के बाद शीर्ष अदालत में इस मामले पर सुनवाई होने की संभावना है।
आखिर अभिषेक बनर्जी को क्यों मिला था रक्षाकवच?
दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ अलग-अलग थानों में कई शिकायतें और एफआईआर दर्ज की गई थीं। अभिषेक ने इन मामलों को राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित बताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया था। उन्होंने अदालत में दावा किया था कि उनके खिलाफ कुल 16 एफआईआर दर्ज की गई हैं।
25 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने तीन मामलों में उन्हें अंतरिम संरक्षण प्रदान किया था। इनमें भवानीपुर, कालीतला और विष्णुपुर थाने से जुड़े मामले शामिल थे। अदालत ने 30 नवंबर तक उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द नहीं की थी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि पुलिस अपनी जांच जारी रख सकती है और अभिषेक को जांच में सहयोग करना होगा।
राज्य सरकार को रक्षाकवच पर क्यों है आपत्ति?
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान ही इस राहत का विरोध किया था। सरकार की दलील थी कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ लगे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और आपराधिक मामलों में राहत पाने के लिए कानून में अग्रिम जमानत जैसे अलग-अलग विकल्प मौजूद हैं।
राज्य ने सवाल उठाया था कि जब प्रत्येक एफआईआर के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, तो एक साथ कई मामलों में व्यापक संरक्षण क्यों दिया गया? सरकार का यह भी तर्क था कि अलग-अलग मामलों को एक ही याचिका के माध्यम से चुनौती देना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने उस समय राज्य की रोक लगाने की मांग खारिज कर दी थी। अब राज्य सरकार ने इसी अंतरिम आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
2017 और 2020 के पुराने मामलों पर भी अदालत की नजर
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कालीतला और विष्णुपुर से जुड़े मामलों की समय-सीमा को लेकर भी सवाल उठे थे। अदालत के सामने बताया गया कि कालीतला से संबंधित घटना 2017 की, जबकि विष्णुपुर से जुड़ी घटना 2020 की है। इन मामलों में शिकायतें काफी समय बाद, जून 2026 में दर्ज कराई गई थीं।
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने इन मामलों में अभिषेक बनर्जी की सीधी भूमिका स्पष्ट नहीं होने की बात पर भी ध्यान दिया था। हालांकि, अदालत ने यह अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया था कि ये मामले राजनीतिक प्रतिशोध के तहत दर्ज किए गए हैं।
जांच जारी रहेगी, अभिषेक को करना होगा सहयोग
हाईकोर्ट के आदेश में अभिषेक बनर्जी को कुछ शर्तों के साथ राहत दी गई थी। पुलिस को पूछताछ के लिए बुलाने से कम से कम 48 घंटे पहले नोटिस देना होगा। वहीं, अभिषेक को जांच में सहयोग करना अनिवार्य है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द नहीं की जा रही हैं और जांच पर कोई रोक नहीं है। हाईकोर्ट ने पुलिस से 23 नवंबर को जांच की प्रगति रिपोर्ट पेश करने को भी कहा है।
अब इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद अहम होगा। एक तरफ कलकत्ता हाईकोर्ट में जांच की प्रगति पर सुनवाई होनी है, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार की याचिका पर शीर्ष अदालत का फैसला अभिषेक बनर्जी को मिली अंतरिम राहत का भविष्य तय कर सकता है।