सोना हमेशा से केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके प्रबंधन का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि किसी देश के पास कितना सोना है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो गया है कि उसका सोना आखिर रखा कहां है और संकट के समय उस तक कितनी जल्दी पहुंच बनाई जा सकती है। दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक टकराव और वित्तीय अनिश्चितताओं के बीच केंद्रीय बैंक अपने भंडार की संरचना और भंडारण व्यवस्था की दोबारा समीक्षा कर रहे हैं। विश्व स्वर्ण परिषद के 2026 के सर्वेक्षण में भी सोने के भंडारण के स्थान में बदलाव की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई दी है। सर्वेक्षण के अनुसार, पिछले 12 महीनों में 9% केंद्रीय बैंकों ने घरेलू भंडारण बढ़ाया, जबकि 10% ने विदेशों में अपने भंडारण स्थानों का विविधीकरण किया।
नीदरलैंड ने 86 टन सोना लंदन पहुंचाया
नीदरलैंड का हालिया कदम इस बदलती रणनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उसके केंद्रीय बैंक ने मार्च से अगस्त 2026 के बीच अमेरिका और कनाडा में रखे लगभग 86 टन सोने को लंदन स्थानांतरित किया है। इस कदम का उद्देश्य किसी एक देश से संबंध घटाना मात्र नहीं, बल्कि संकट की स्थिति में सोने को अधिक आसानी से उपयोग करने योग्य बनाना और उसके व्यापारिक उपयोग को बेहतर बनाना बताया गया है। लंदन भौतिक सोने के अंतरराष्ट्रीय कारोबार का प्रमुख केंद्र है, जहां मानकीकृत सोने की छड़ों का व्यापक कारोबार होता है। नीदरलैंड के केंद्रीय बैंक के अनुसार, भंडार को उत्तर अमेरिका, ब्रिटेन और नीदरलैंड के बीच अधिक संतुलित ढंग से रखना जोखिम फैलाने के साथ-साथ आपात स्थिति में सोने की उपलब्धता बढ़ाता है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विदेश में रखा सोना सामान्य परिस्थितियों में अत्यधिक उपयोगी हो सकता है, लेकिन संकट के समय उसकी उपलब्धता कई बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर कर सकती है। दूसरी ओर, लंदन जैसे बड़े स्वर्ण व्यापार केंद्र में सोने की मौजूदगी उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से बेचने, बदलने या अन्य वित्तीय जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने की सुविधा देती है। नीदरलैंड ने इसी व्यापारिक सुगमता और संकट से निपटने की तैयारी को अपने फैसले के प्रमुख कारणों में रखा है। इसलिए इसे केवल सोने को एक तिजोरी से दूसरी तिजोरी में ले जाने की सामान्य प्रक्रिया के रूप में देखना सही नहीं होगा, बल्कि यह केंद्रीय बैंक के भंडार प्रबंधन में जोखिम, उपलब्धता और बाजार पहुंच के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।
फ्रांस ने गुणवत्ता के कारण बदली सोने की जगह
फ्रांस का मामला कुछ अलग है और इससे यह स्पष्ट होता है कि सोने के भंडारण का निर्णय केवल भू-राजनीतिक कारणों से नहीं लिया जाता। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार फ्रांस ने न्यूयॉर्क में रखे लगभग 129 टन सोने को यूरोप स्थानांतरित किया। इसके पीछे मुख्य वजह सोने की छड़ों की गुणवत्ता और शुद्धता से जुड़ी आवश्यकताएं बताई गई हैं। यानी केंद्रीय बैंक के लिए यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उसके पास मौजूद सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वीकार्य मानकों के अनुरूप हो और जरूरत पड़ने पर बिना किसी तकनीकी अड़चन के उसका इस्तेमाल किया जा सके। इस तरह फ्रांस का कदम बताता है कि भंडार प्रबंधन में भौगोलिक स्थान के साथ-साथ सोने की गुणवत्ता और बाजार में उसकी स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण हो गई है।
दरअसल, केंद्रीय बैंकों के लिए सोना केवल एक मूल्यवान धातु नहीं, बल्कि दीर्घकालीन रणनीतिक संपत्ति है। इसलिए उसकी शुद्धता, मानकीकरण, सुरक्षित रखरखाव और जरूरत पड़ने पर कारोबार की क्षमता सभी पहलुओं का महत्व बढ़ जाता है। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार केंद्रीय बैंक भौतिक सोने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानक वाली छड़ों को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि किसी केंद्रीय बैंक के लिए किसी खास स्थान पर सोना रखना तभी उपयोगी है, जब वहां सुरक्षा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता की जांच, अभिरक्षा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपयोग की सुविधा भी सुनिश्चित हो।
भारत में 77% सोना अब देश के भीतर
भारत ने भी पिछले कुछ वर्षों में अपने सोने के भंडार को घरेलू स्तर पर रखने की दिशा में उल्लेखनीय बदलाव किया है। मार्च 2026 के अंत तक भारतीय रिजर्व बैंक के पास कुल 880.52 टन सोना था, जिसमें से 680.05 टन देश के भीतर रखा गया था। इसका अर्थ है कि कुल स्वर्ण भंडार का लगभग 77.23% हिस्सा घरेलू स्तर पर था, जबकि लगभग 197.67 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स की सुरक्षित अभिरक्षा में था। इसके अतिरिक्त 2.80 टन सोना जमा के रूप में रखा गया था। सितंबर 2025 के अंत में घरेलू स्तर पर रखे सोने की मात्रा 575.82 टन थी, यानी केवल 6 महीनों में घरेलू भंडार में लगभग 104 टन की वृद्धि हुई।
भारत का यह बदलाव इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि यह केवल नए सोने की खरीद का परिणाम नहीं है, बल्कि बड़ी मात्रा में पहले से मौजूद सोने को विदेश से देश में लाने से भी जुड़ा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय रिजर्व बैंक कुल 168.06 टन सोना भारत वापस ला चुका था। इसके साथ घरेलू भंडारण का हिस्सा मार्च 2023 के लगभग 38% से बढ़कर मार्च 2026 में 77% से अधिक हो गया। इसका अर्थ है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय केंद्रीय बैंक ने अपने स्वर्ण भंडार के स्थान को लेकर लगातार पुनर्संतुलन किया है। हालांकि विदेशों में रखा सोना भी रणनीतिक रूप से उपयोगी है, लेकिन घरेलू भंडारण बढ़ने से भौतिक नियंत्रण और प्रत्यक्ष अभिरक्षा मजबूत होती है।
केंद्रीय बैंक क्यों बढ़ा रहे हैं सोने की खरीद?
सोने के भंडारण स्थान में यह बदलाव उस समय हो रहा है जब केंद्रीय बैंकों की सोने में रुचि भी लगातार बढ़ी है। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार पिछले 4 वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने औसतन हर वर्ष लगभग 1,000 टन सोना अपने भंडार में जोड़ा है, जबकि इससे पहले के दशक में यह औसत लगभग 500 टन प्रतिवर्ष था। 2025 में केंद्रीय बैंकों की शुद्ध सोना खरीद 863 टन रही, जो पिछले लगातार 3 वर्षों के 1,000 टन से अधिक के स्तर से कम जरूर थी, लेकिन ऐतिहासिक मानकों पर अब भी काफी ऊंची रही। इससे संकेत मिलता है कि सोना केंद्रीय बैंकों की दीर्घकालीन आरक्षित संपत्ति के रूप में पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो चुका है।
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता है। सोना किसी दूसरे देश की देनदारी नहीं होता और इसे किसी केंद्रीय बैंक या सरकार की वित्तीय क्षमता पर निर्भर परिसंपत्ति की तरह नहीं देखा जाता। संकट के समय इसकी भूमिका और मजबूत हो जाती है, जबकि महंगाई, मुद्रा संबंधी जोखिम और वैश्विक वित्तीय अस्थिरता के दौर में यह भंडार में विविधता लाने का साधन भी बनता है। विश्व स्वर्ण परिषद के 2026 के सर्वेक्षण में 90% उत्तरदाताओं ने संकट के समय सोने के प्रदर्शन को उसे रखने का प्रमुख कारण बताया। 84% ने इसे दीर्घकालीन मूल्य-संरक्षण का माध्यम और 82% ने भंडार में विविधता लाने वाला साधन माना।
विदेश में सोना रखना भी पूरी तरह गलत रणनीति नहीं
घरेलू भंडारण बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि विदेशों में सोना रखना अब अप्रासंगिक हो गया है। वास्तव में केंद्रीय बैंकों के लिए विदेशों में सुरक्षित भंडारण की अपनी अलग उपयोगिता है। बड़े अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों में रखा सोना जरूरत पड़ने पर वैश्विक बाजार में कारोबार, ऋण व्यवस्था या अन्य वित्तीय लेनदेन में इस्तेमाल करना अपेक्षाकृत आसान बना सकता है। विश्व स्वर्ण परिषद के 2025 के सर्वेक्षण में बैंक ऑफ इंग्लैंड सबसे लोकप्रिय भंडारण स्थान रहा था और 64% उत्तरदाताओं ने इसे अपने स्वर्ण भंडार के कम से कम एक हिस्से के लिए भंडारण केंद्र के रूप में चुना था। इससे स्पष्ट है कि घरेलू भंडारण बढ़ने के बावजूद प्रमुख अंतरराष्ट्रीय केंद्रों की भूमिका समाप्त नहीं हुई है।
असल रणनीति अब एक ही स्थान पर पूरा भंडार रखने के बजाय जोखिम को अलग-अलग स्थानों में बांटने की ओर जाती दिखाई दे रही है। यदि पूरा सोना किसी एक देश या एक ही वित्तीय केंद्र में रखा जाए तो राजनीतिक तनाव, प्रतिबंध, कानूनी विवाद या किसी गंभीर संकट की स्थिति में उस तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, पूरा सोना देश के भीतर रखने पर अत्याधुनिक तिजोरियों, सुरक्षा, बीमा, लेखा-परीक्षण और रखरखाव का खर्च बढ़ सकता है। इसलिए केंद्रीय बैंक अब सुरक्षा, नियंत्रण, लागत, तरलता और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि कुछ देश घरेलू भंडारण बढ़ा रहे हैं तो कुछ विदेशों में अपने भंडारण स्थानों का विविधीकरण कर रहे हैं।
असली बदलाव सोने की मात्रा में नहीं, नियंत्रण की सोच में है
दुनिया के केंद्रीय बैंकों की मौजूदा गतिविधियों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह बदलाव केवल सोना खरीदने या उसे एक जगह से दूसरी जगह भेजने की कहानी नहीं है। यह केंद्रीय बैंकों की उस बदलती सोच को दर्शाता है जिसमें स्वर्ण भंडार को अधिक सुरक्षित, अधिक उपलब्ध और रणनीतिक रूप से उपयोगी बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। विश्व स्वर्ण परिषद के 2026 के सर्वेक्षण में 93% उत्तरदाताओं ने बताया कि उनके पास सोना है और 89% को उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में दुनिया के केंद्रीय बैंकों का स्वर्ण भंडार बढ़ेगा। साथ ही, 10% केंद्रीय बैंकों ने पिछले 12 महीनों में विदेशों में अपने भंडारण स्थानों का विविधीकरण किया है।
भारत, नीदरलैंड और फ्रांस के कदमों में अंतर जरूर है, लेकिन तीनों घटनाओं से एक साझा संदेश निकलता है। अब केंद्रीय बैंक यह तय करने में अधिक सावधानी बरत रहे हैं कि उनकी रणनीतिक संपत्ति किस स्थान पर रहे, संकट के समय उस पर उनका कितना प्रभावी नियंत्रण हो और आवश्यकता पड़ने पर उसे कितनी तेजी से वित्तीय संसाधन में बदला जा सके। भारत का घरेलू भंडारण 77% से अधिक होना इसी व्यापक बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। आने वाले वर्षों में सोने की बढ़ती मांग के साथ उसके भंडारण का भूगोल भी बदल सकता है और केंद्रीय बैंकों के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण हो सकता है कि सुरक्षित सोना केवल कितना है नहीं, बल्कि वह कहां है और जरूरत पड़ने पर कितनी जल्दी उपलब्ध हो सकता है।