नई दिल्ली : मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के बीच रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और तेज हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, ईंधन महंगा होने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।
चार बार में 7.5 रुपये महंगा हुआ ईंधन
15 मई से 25 मई के बीच पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस दौरान दोनों ईंधनों के दाम कुल मिलाकर करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं। क्रिसिल का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो यह बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है।
महंगाई दर पर सीधा असर पड़ने का अनुमान
रिपोर्ट के मुताबिक, ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का असर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर भी पड़ेगा। मौजूदा बढ़ोतरी से महंगाई दर में करीब 36 बेसिस पॉइंट का असर पड़ने का अनुमान है। वहीं यदि कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचती है तो यह प्रभाव बढ़कर 48 बेसिस पॉइंट तक हो सकता है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर सबसे ज्यादा दबाव
भारत में करीब 71 प्रतिशत माल ढुलाई सड़क मार्ग से होती है और इस क्षेत्र में ईंधन लागत का हिस्सा लगभग 42 प्रतिशत है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल महंगा होने से माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स की लागत तेजी से बढ़ेगी, जिसका असर पूरी सप्लाई चेन पर देखने को मिलेगा।
दूध, दाल और रोजमर्रा की चीजें होंगी महंगी
विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती परिवहन लागत का सबसे अधिक असर उन वस्तुओं पर पड़ेगा जो लॉजिस्टिक्स पर निर्भर हैं। इनमें डेयरी उत्पाद, चाय, कॉफी, फल, दालें, मसाले, अंडे, मांस और मछली जैसी जरूरी वस्तुएं शामिल हैं। इनकी कीमतों में आने वाले समय में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।
कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर भी प्रभावित
क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती ईंधन और ऊर्जा लागत के कारण कोर महंगाई पर भी दबाव बनेगा। कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, लकड़ी, सीमेंट और सिरेमिक उद्योगों में उत्पादन लागत बढ़ने से कई उत्पादों के दाम ऊपर जा सकते हैं।
कंपनियां अपना सकती हैं 'श्रिंकफ्लेशन' रणनीति
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मांग स्थिर रहने की स्थिति में कंपनियां कीमतें बढ़ाने के बजाय 'श्रिंकफ्लेशन' का रास्ता अपना सकती हैं। इसके तहत उत्पाद का आकार या मात्रा कम कर दी जाती है, जबकि कीमतें पहले जैसी ही रखी जाती हैं।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनी बड़ी चिंता
वित्त वर्ष के शुरुआती दो महीनों में कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 112 डॉलर प्रति बैरल रही, जो अनुमानित 95 डॉलर प्रति बैरल से काफी अधिक है। इसी वजह से महंगाई पर दबाव बढ़ने और ईंधन कीमतों में आगे और बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।