डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी देखने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप किया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने पिछले शुक्रवार को ऑनशोर और ऑफशोर दोनों बाजारों में लगभग 7 अरब डॉलर की बिक्री की। माना जा रहा है कि एक ही दिन में किया गया यह हस्तक्षेप कई महीनों में सबसे बड़ा था। इसका उद्देश्य रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने से रोकना और विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना था। हालांकि, RBI ने इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया था रुपया
हाल के दिनों में डॉलर की मजबूती और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। गुरुवार को रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 95.74 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जबकि इसका अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर 96.96 रहा है, जिसे इस वर्ष 20 मई को छुआ गया था। विदेशी निवेश की निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति जैसी परिस्थितियों ने भारतीय मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डाला।
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई चुनौती
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इसका सीधा असर रुपये की विनिमय दर पर पड़ता है। यही वजह है कि हाल के दिनों में केवल भारत ही नहीं, बल्कि फिलीपींस जैसे अन्य एशियाई देशों के केंद्रीय बैंकों को भी अपनी-अपनी मुद्राओं को सहारा देने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा।
लगातार दो और सत्रों में भी जारी रही डॉलर की बिक्री
रिपोर्टों के अनुसार, शुक्रवार के बड़े हस्तक्षेप के बाद भी RBI ने अगले दो कारोबारी सत्रों में डॉलर की बिक्री जारी रखी। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ी और रुपये को कुछ राहत मिली। विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय बैंक का उद्देश्य किसी निश्चित विनिमय दर को बनाए रखना नहीं, बल्कि अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना और बाजार में संतुलन कायम रखना होता है। इसी रणनीति के तहत RBI समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है।
विदेशी मुद्रा भंडार ने बढ़ाई RBI की क्षमता
हाल के महीनों में विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने के लिए उठाए गए कदमों का सकारात्मक असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी देखने को मिला है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के कारण RBI के पास बाजार में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक रुपये की अत्यधिक कमजोरी को रोकने के लिए जरूरत पड़ने पर बड़े पैमाने पर डॉलर की बिक्री करने की स्थिति में है।
आगे क्या रहेगा बाजार का फोकस?
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में रुपये की दिशा कई वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भारतीय मुद्रा की चाल तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। यदि वैश्विक दबाव बना रहता है, तो RBI आगे भी जरूरत के अनुसार विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है ताकि रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।