त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले ही चीनी और गुड़ की कीमतों में तेज उछाल ने घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा दिया है। कुछ महीने पहले तक जहां चीनी करीब 40-45 रुपये प्रति किलो के भाव में खुदरा बाजार में उपलब्ध थी, वहीं अब कई जगह इसका भाव 60-62 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। इसी तरह गुड़, जो पहले करीब 40-45 रुपये किलो बिक रहा था, उसके दाम भी बढ़कर 60-65 रुपये किलो तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। यानी कुछ बाजारों में गुड़ की कीमत में करीब 20 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि हुई है। अचानक आई इस तेजी ने उपभोक्ताओं के साथ खुदरा कारोबारियों को भी हैरान कर दिया है।
20 दिन से लगातार बढ़ रहे हैं दाम
फुटकर कारोबारियों के अनुसार चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी पिछले कुछ दिनों की घटना नहीं है, बल्कि करीब 20 दिनों से बाजार में लगातार तेजी देखी जा रही है। कारोबारियों का कहना है कि कांवड़ यात्रा शुरू होने के समय से ही चीनी के दाम ऊपर जाने लगे थे। शुरुआती दौर में कुछ लोगों ने परिवहन व्यवस्था और रास्तों में बदलाव को कीमत बढ़ने की वजह माना, लेकिन अब लगातार हो रही वृद्धि के पीछे केवल यही कारण पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। खुदरा दुकानदारों का कहना है कि ग्राहक लगातार उनसे बढ़े हुए दाम का कारण पूछ रहे हैं, लेकिन बाजार में कीमतों को प्रभावित करने वाले सभी कारणों की स्पष्ट जानकारी उन्हें भी नहीं मिल पा रही है।
त्योहारों की बढ़ती मांग ने बढ़ाया दबाव
चीनी की कीमतों में तेजी का एक बड़ा कारण आगामी त्योहारों के कारण मांग में होने वाली वृद्धि को माना जा रहा है। गणेश उत्सव, नवरात्रि, दशहरा और दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान मिठाइयों, पेय पदार्थों और विभिन्न खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ती है। इससे चीनी की खपत भी सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। सामान्य परिस्थितियों में बाजार इस अतिरिक्त मांग को पहले से उपलब्ध स्टॉक और चीनी मिलों की आपूर्ति के जरिए संभाल लेता है, लेकिन इस बार कीमतों में तेजी अधिक दिखाई दे रही है। मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ने पर थोक से लेकर खुदरा बाजार तक कीमतों पर उसका असर पड़ना स्वाभाविक है।
चीनी मिलों की सीमित बिक्री भी बनी वजह
चीनी की कीमतों को समझने के लिए उत्पादन और बिक्री की मौजूदा व्यवस्था को भी देखना जरूरी है। चीनी मिलों का परिचालन पूरे वर्ष एक समान नहीं रहता और उत्पादन सत्र समाप्त होने के बाद बाजार में उपलब्धता मुख्य रूप से पहले से मौजूद भंडार और सरकार की निर्धारित बिक्री व्यवस्था पर निर्भर रहती है। सरकार चीनी की घरेलू उपलब्धता और कीमतों को संतुलित रखने के लिए मिलों के बिक्री कोटे से संबंधित व्यवस्थाएं लागू करती है। ऐसे में यदि बाजार में मांग बढ़ती है और उसी अनुपात में तत्काल आपूर्ति उपलब्ध नहीं होती, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इस समय त्योहारों से पहले बढ़ती मांग के बीच यही स्थिति बाजार में तेजी का एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है।
एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी उठ रहे सवाल
चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे एथेनॉल उत्पादन का पहलू भी चर्चा में है। चीनी उद्योग में गन्ने और उससे बनने वाले विभिन्न उत्पादों का उपयोग केवल चीनी बनाने तक सीमित नहीं है। सरकार की एथेनॉल मिश्रण नीति के तहत गन्ने के रस, शीरे और चीनी उद्योग से जुड़े अन्य कच्चे माल के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है। इससे गन्ने के एक हिस्से का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में होता है और बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि खुदरा कारोबारियों के स्तर पर इस समय की तेज कीमत वृद्धि को केवल एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना संभव नहीं है। इसके लिए उत्पादन, स्टॉक, सरकारी बिक्री नीति और मांग के पूरे आंकड़ों को साथ देखकर ही स्पष्ट निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
इस बार तेजी ने कारोबारियों को भी चौंकाया
फुटकर कारोबारियों का कहना है कि पिछले वर्ष भी त्योहारों के दौरान चीनी के दाम बढ़े थे, लेकिन उस समय वृद्धि केवल 2-3 रुपये प्रति किलो के आसपास रही थी। इस बार कीमतों में आया उछाल कहीं अधिक बड़ा है और इसी वजह से बाजार में चिंता बढ़ी है। कारोबारियों के मुताबिक उन्होंने इतनी तेज वृद्धि पहले कम ही देखी है। जब थोक बाजार में कीमत लगातार ऊपर जाती है, तो खुदरा विक्रेताओं के लिए पुराने भाव पर माल बेचना मुश्किल हो जाता है। परिणामस्वरूप कुछ ही समय में नई खरीद की लागत ग्राहकों तक पहुंचने लगती है और खुदरा कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
मिठाई, बिस्किट और खाद्य उत्पाद हो सकते हैं महंगे
चीनी की कीमत में तेज वृद्धि का असर केवल घरों में चाय या अन्य घरेलू उपयोग तक सीमित नहीं रहेगा। मिठाई उद्योग, बिस्किट निर्माता, पेय पदार्थ कंपनियां, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने वाली इकाइयां भी चीनी की बड़ी उपभोक्ता हैं। उत्पादन लागत बढ़ने पर कंपनियों और कारोबारियों के सामने या तो अपने लाभ का हिस्सा कम करने या उत्पादों की कीमत बढ़ाने का विकल्प रहता है। त्योहारों के दौरान मिठाई और अन्य मीठे खाद्य पदार्थों की मांग पहले ही बढ़ जाती है, इसलिए कच्चे माल की महंगाई का असर अंतिम उत्पादों पर पड़ने की संभावना भी बढ़ जाती है। यदि चीनी की कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है तो उपभोक्ताओं को इसका सीधा असर बाजार में दिखाई दे सकता है।
गुड़ की कीमत बढ़ने के पीछे भी मांग और आपूर्ति का दबाव
चीनी के साथ गुड़ की कीमतों में भी बढ़ोतरी ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। गुड़ का उपयोग घरेलू उपभोग के अलावा मिठाई, पारंपरिक खाद्य पदार्थों और विभिन्न स्थानीय उत्पादों में किया जाता है। त्योहारों के दौरान इसकी मांग बढ़ने के साथ-साथ उपलब्धता और परिवहन लागत भी कीमत को प्रभावित करती है। जब चीनी महंगी होती है तो कुछ उपभोक्ता और छोटे कारोबारी गुड़ जैसे विकल्पों की ओर भी रुख कर सकते हैं, जिससे उसकी मांग पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। यही कारण है कि बाजार में चीनी के साथ गुड़ की कीमतों में भी तेजी दिखाई दे रही है।
सरकार के लिए अब कीमतों पर नजर रखना जरूरी
चीनी और गुड़ की कीमतों में लगातार वृद्धि ऐसे समय हुई है, जब त्योहारों का मौसम सामने है और घरेलू खपत सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। इसलिए आने वाले दिनों में सरकार के लिए बाजार में स्टॉक, मिलों की बिक्री, थोक कीमतों और खुदरा भाव की लगातार निगरानी महत्वपूर्ण होगी। यदि आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन बढ़ता है तो समय रहते बाजार में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं। फिलहाल कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण एक साथ काम करते दिखाई दे रहे हैं और यह स्पष्ट करना जल्दबाजी होगी कि किसी एक कारण ने पूरी वृद्धि को जन्म दिया है। लेकिन इतना जरूर है कि यदि मौजूदा रुझान त्योहारों तक जारी रहा, तो चीनी और उससे जुड़े उत्पादों की महंगाई आम उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है।