एक जमाना था जब ग्वालियर में स्वर्ण रेखा नदी को शहर की लाइफ लाइन कहा जाता था. राजा महाराजा के दौर में लोग इस नदी में नहाने के लिए आते थे. शहर के बीचों-बीच से प्रवाहित होने वाली स्वर्ण रेखा नदी किसी समय शहर के पेयजल और अन्य जरूरतों को पूरा करने वाली नदी थी. लेकिन, पिछले कुछ दशकों में स्वर्ण रेखा नदी में शहर के नालों के मिलने से हालात बिगड़ने लगे. नदी के किनारों पर अतिक्रमण और पक्का निर्माण होने से धीरे-धीरे इसके अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया. आज आलम ये है कि स्वर्ण रेखा नदी एक बड़े नाले में तब्दील हो गई है.
स्वर्णरेखा के आसपास शहर की करीब 2 लाख से ज्यादा आबादी रहती है. ये लोग नारकीय जिंदगी जीने को मजबूर हैं. सामाजिक कार्यकर्ता इस मुद्दे को हाई कोर्ट में ले गए, तो वहां भी शासन-प्रशासन ने कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की. सामाजिक कार्यकर्ता विश्वजीत रतोनिया का कहना है कि स्वर्णरेखा नदी को फिर से प्रवाहित करने के नाम पर कई योजनाएं बनीं. बीते 20 साल के अंदर इसे लंदन की टेम्स नदी की तरह बनाने के नाम पर 200 करोड़ से ज्यादा का खर्च हो चुका है
20 साल में खर्च हो चुके 200 करोड़ रुपये
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