जबलपुर के जंगलों में अब तेंदुओं के साथ बाघों का कुनबा भी जल्द ही बढ़ेगा। बाघों के पुनर्वास योजना के तहत करीब 20 दिन पूर्व पन्ना टाइगर रिजर्व नेशनल पार्क से लाए गए मेल-फीमेल बाघ के जोड़े को जबलपुर के पाटन से लगे मेरेगाँव के जंगल में छोड़ा गया है। चूंकि पाटन का 27 मील का जंगल बाघों का पुराना गलियारा और पसंदीदा क्षेत्र रहा है। इसलिए उम्मीद जताई जा रही है कि यहाँ एक बार फिर से बाघों का कुनबा बढ़ेगा।
वाइल्ड लाइफ टाइगर कंजरवेशन ग्रुप ने किया था सर्वे
दरअसल पन्ना टाइगर रिजर्व नेचर का एक बड़ा हिस्सा केन-बेतवा डैम के निर्माण को लेकर डूब क्षेत्र में आ रहा है। जिसको लेकर यहाँ बसने वाले बाघों के पुनर्वास को लेकर कई सालों से शिफ्टिंग की तैयारी की जा रही थी। इसके लिए कई सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा सर्वे किए जा रहे थे। इनमें से एक वाइल्ड लाइफ टाइगर कंजरवेशन ग्रुप ने सैटेलाइट सर्वे किया था, जिसमें जबलपुर से लगे नौरादेही के जंगल को बाघों के पुनर्वास के लिए अनुकूल पाया गया। लिहाजा केन्द्रीय वन मंत्रालय समेत सभी विभागों की अनुमति के बाद मेरेगाँव के जंगल को चिहिन्त करके यहाँ बाघ-बाघिन को छोड़ा गया है। इसके लिए एक टीम लगातार मॉनिटरिंग भी करेगी जो कॉलर आईडी के जरिए बाघ-बाघिन की हर गतिविधि पर नजर रखेगी।
पहाड़ी रास्तों को ज्यादा पसंद करते है बाघ
इस मामले में रिसर्च करने वाली वाइल्ड लाइफ टाइगर कंजरवेशन ग्रुप की डॉ. दीपा कुलश्रेष्ठ के अनुसार बाघ एक दिन में 200 से 250 किलोमीटर तक का सफर कर सकते हैं। बाघ मैदानी इलाकों से ज्यादा पहाड़ी रास्तों को आवागमन के लिए पसंद करते हैं। चूंकि नौरादेही का जंगल पाटन-तेंदूखेड़ा से लगी पहाडिय़ों से जुड़ा हुआ है। पाटन का 27 मील, प्राचीन समय से बाघों का रहवास रहा है। शेर प्रजाति के सभी वन्य प्राणियों में एक विशेष बात होती है कि वो अपने पूर्वजों के पुराने गलियारों को खोजते हुए जरूर पहुंचते हैं। इसलिए आकलन लगाया जा रहा है कि नौरादेही में छोड़े गए बाघ-बाघिन पाटन के पास बगदरी फॉल की पहाडिय़ों तक जरूर पहुंचेंगे। जिससे जबलपुर का जंगल एक बार फिर बाघ मूवमेंट एरिया से मशहूर हो जाएगा।
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