भोपाल:मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों वंशवाद को लेकर नई बहस छिड़ गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने नेता पुत्रों की एंट्री पर बड़ा बयान देते हुए साफ कहा है कि बच्चों को जबरन राजनीति में लाना सही नहीं है। उनके इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है और इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं।
युवा विधायक सम्मेलन में सीएम का स्पष्ट संदेश
विधानसभा में आयोजित युवा बीजेपी विधायकों के सम्मेलन में सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा कि राजनीति में आगे बढ़ने के लिए योग्यता जरूरी है, न कि पारिवारिक पृष्ठभूमि। उन्होंने साफ किया कि यदि किसी में क्षमता होगी तो वह खुद अपनी जगह बना लेगा, लेकिन जबरदस्ती किसी को स्थापित करना गलत है।
इतिहास और धर्म के दिए उदाहरण
सीएम डॉ.यादव ने अपने विचार को मजबूत करने के लिए विक्रमादित्य और भगवान कृष्ण का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि दोनों के पास विशाल सत्ता और परिवार होने के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों को उत्तराधिकारी नहीं बनाया, जो लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल है।
‘जबरदस्ती से राजनीति होती है कमजोर’
मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर बच्चों में योग्यता होगी तो वे खुद आगे आ जाएंगे। लेकिन यदि उन्हें जबरन राजनीति में लाया जाता है तो इससे न केवल पार्टी बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था कमजोर होती है। उनका यह बयान वंशवाद पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। यह बयान उस समय आया जब भोपाल में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के युवा बीजेपी विधायकों का दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया है। इसमें 45 साल से कम उम्र के विधायक शामिल है और संगठनात्मक मुद्दों पर चर्चा की जा रही है।
चुनाव से पहले नेता पुत्रों की रही चर्चा
पिछले विधानसभा चुनाव से पहले कई बड़े नेताओं के बेटों को टिकट दिलाने की चर्चाएं तेज थीं। हालांकि पार्टी की ‘एक परिवार, एक टिकट’ नीति और कार्यकर्ताओं के विरोध के चलते कई मामलों में यह संभव नहीं हो पाया। प्रदेश में कई वरिष्ठ नेताओं के बेटे लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं और अवसर का इंतजार कर रहे हैं। इनमें विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर,पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन के बेटे मुदित शेजवार,पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव के बेटे अभिषेक भार्गव और जयंत के बेटे सिद्धार्थ मलैया जैसे नाम शामिल हैं।
सीएम के बयान के सियासी मायने
सीएम डॉ.मोहन यादव का यह बयान पार्टी के भीतर एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। इसे योग्यता आधारित राजनीति को बढ़ावा देने और वंशवाद पर लगाम लगाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका असर आने वाले समय में टिकट वितरण और संगठनात्मक फैसलों में भी दिख सकता है।