पश्चिम एशिया में चल रहे सैन्य तनाव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को अस्थिर बना दिया है और इसका असर बहुपक्षीय संगठनों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ब्रिक्स जैसे प्रभावशाली समूह के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस संघर्ष पर एक समान और संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सके। सदस्य देशों के भू-राजनीतिक हित अलग-अलग होने के कारण इस विषय पर सामूहिक सहमति बनाना आसान नहीं रह गया है। यही कारण है कि अभी तक इस मुद्दे पर समूह की ओर से कोई स्पष्ट और एकमत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
भारत की अध्यक्षता और बढ़ती कूटनीतिक जिम्मेदारी
इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है और ऐसे संवेदनशील दौर में भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। भारत की कोशिश यह है कि समूह के सभी सदस्य देशों के विचारों और हितों को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित और स्वीकार्य रुख तैयार किया जाए। यह कार्य इसलिए भी जटिल हो गया है क्योंकि संघर्ष में शामिल कुछ देश स्वयं इस समूह का हिस्सा हैं, जिससे मतभेद और गहरे हो जाते हैं। इसके बावजूद भारत संवाद और समन्वय के माध्यम से समाधान तलाशने की दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहा है।
विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया और स्थिति की जटिलता
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने संवाददाताओं से बातचीत में संकेत दिया कि ब्रिक्स के कुछ सदस्य देश इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल हैं। ऐसी स्थिति में समूह के लिए एक समान दृष्टिकोण बनाना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत इस विषय पर लगातार सदस्य देशों के संपर्क में है और कूटनीतिक माध्यमों के जरिए सहमति बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। उनका कहना था कि विचारों की भिन्नता के बावजूद संवाद जारी रखना ही इस चुनौती का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है।
शेरपा चैनल के माध्यम से जारी संवाद
ब्रिक्स देशों के बीच विचार-विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर विभिन्न तंत्र सक्रिय किए गए हैं। इसी क्रम में शेरपा चैनल के माध्यम से सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के बीच लगातार संवाद चल रहा है। हाल ही में 12 मार्च को शेरपा स्तर की एक महत्वपूर्ण बैठक डिजिटल माध्यम से आयोजित की गई, जिसमें पश्चिम एशिया की स्थिति और संभावित सामूहिक प्रतिक्रिया पर चर्चा की गई। इस प्रकार के संवादों का उद्देश्य यह है कि सभी पक्षों की चिंताओं और दृष्टिकोणों को समझते हुए एक संतुलित मार्ग निकाला जा सके।
द्विपक्षीय कूटनीति के माध्यम से समाधान की कोशिश
भारत केवल बहुपक्षीय मंचों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि द्विपक्षीय कूटनीति के माध्यम से भी स्थिति को समझने और समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है। इसी क्रम में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच दूरभाष पर बातचीत हुई है। इस संवाद में क्षेत्रीय परिस्थितियों, तनाव कम करने की संभावनाओं और कूटनीतिक प्रयासों पर विचार किया गया। भारत की प्राथमिकता यह है कि संवाद और संतुलित कूटनीति के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखा जाए।
ब्रिक्स के विस्तार के बाद बदले समीकरण
ब्रिक्स समूह का विस्तार होने के बाद इसकी संरचना और प्रभाव दोनों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। प्रारंभ में इस समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश शामिल थे, लेकिन 2024 में इसका दायरा बढ़ाकर कई नए देशों को इसमें जोड़ा गया। इस विस्तार के तहत मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को भी समूह में शामिल किया गया। इससे समूह की वैश्विक उपस्थिति तो मजबूत हुई है, लेकिन साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के राजनीतिक हितों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के कारण निर्णय प्रक्रिया और अधिक जटिल हो गई है।
संतुलन की कूटनीति और भारत की भूमिका
वर्तमान परिस्थिति में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह ब्रिक्स के भीतर विभिन्न देशों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित करे जो सभी के लिए स्वीकार्य हो सके। पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक महत्व का विषय बन चुका है। ऐसे में ब्रिक्स जैसे मंच की सामूहिक प्रतिक्रिया भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है। भारत की कूटनीतिक रणनीति फिलहाल संवाद, सहमति और संतुलन के सिद्धांतों पर आधारित दिखाई दे रही है।
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