ईरान के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किए गए ज्ञापन समझौते (एमओयू) को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। खास बात यह है कि इस समझौते की आलोचना केवल विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ही नहीं, बल्कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई नेताओं ने भी की है। आलोचकों का कहना है कि इस समझौते से ईरान को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिल सकता है, जबकि अमेरिका को अपेक्षित सुरक्षा गारंटी नहीं मिली है।
बातचीत के बीच बढ़ी राजनीतिक आलोचना
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस स्विट्जरलैंड में ईरानी अधिकारियों के साथ आगे की वार्ताओं में जुटे हुए हैं। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने समझौते का बचाव करते हुए इसे कूटनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत बताया है, जिसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है।
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वाल्ट्ज ने कहा कि प्रशासन पूरी सतर्कता के साथ इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी भविष्य की व्यवस्था का आधार भरोसा नहीं, बल्कि सत्यापन होगा। वाल्ट्ज ने कहा कि शांति और कूटनीति को अवसर दिया जाना चाहिए।
डेमोक्रेट्स ने बताया ‘समर्पण जैसा समझौता’
डेमोक्रेटिक सीनेटर कोरी बुकर ने समझौते का विरोध करते हुए इसे एकतरफा बताया। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था में ईरान को भारी आर्थिक लाभ मिल रहे हैं, जबकि अमेरिका को अपेक्षित रणनीतिक लाभ नहीं दिखाई देते। बुकर ने इसे ट्रंप प्रशासन की बड़ी नीति विफलताओं में से एक करार दिया।
पूर्व रक्षा सचिव ने भी जताई चिंता
अमेरिका के पूर्व रक्षा सचिव मार्क एस्पर ने भी समझौते के कई पहलुओं पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि इस डील में कई रियायतें शुरुआत में ही दे दी गई हैं, जबकि ऐसे प्रोत्साहन आमतौर पर बाद के चरणों में दिए जाने चाहिए थे। उन्होंने समझौते के दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की।
रिपब्लिकन नेताओं ने भी उठाए सवाल
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कूटनीति का समर्थन तो किया, लेकिन समझौते में कमियों को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि बातचीत को मौका दिया जाना चाहिए, हालांकि समझौते के कुछ बिंदुओं पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। वहीं सीनेटर टेड क्रूज ने आशंका जताई कि यदि ईरान को आर्थिक राहत दी जाती है तो उसका उपयोग अमेरिकी हितों के खिलाफ किया जा सकता है। सीनेटर जॉन कॉर्निन ने भी चेतावनी दी कि रिहा किए गए फंड का इस्तेमाल ईरान अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में कर सकता है।
विशेषज्ञों ने भी जताई आशंका
ऊर्जा और विदेश नीति के कई विशेषज्ञों ने समझौते के दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर सवाल खड़े किए हैं। व्हाइट हाउस के पूर्व ऊर्जा सलाहकार अमोस होचस्टीन ने कहा कि यह समझौता अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह संबोधित नहीं करता। वहीं ऊर्जा विश्लेषक केविन बुक का मानना है कि यह व्यवस्था ईरान को तेल निर्यात समेत कई क्षेत्रों में बड़ी राहत दे सकती है।
सरकार को समझौते पर भरोसा
आलोचनाओं के बावजूद ट्रंप प्रशासन समझौते को लेकर आश्वस्त नजर आ रहा है। माइक वाल्ट्ज ने कहा कि सरकार को भरोसा है कि बातचीत के जरिए सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
गौरतलब है कि हाल ही में हस्ताक्षरित इस एमओयू ने अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से जारी तनाव को कम करने की दिशा में एक नया रास्ता खोला है। इसके तहत दोनों देशों को परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा के लिए 60 दिनों का समय मिला है।