अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने मंगलवार शाम लिंडसे ओ ग्राहम सैंकसनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ दो हजार छब्बीस को एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक मंजूरी प्रदान की। इस बिल के पक्ष में दो सौ चौदह वोट पड़े जबकि दो सौ ग्यारह सांसदों ने विरोध किया। दो डेमोक्रेट सांसदों ने रिपब्लिकन सदस्यों के साथ मिलकर इस बिल का समर्थन किया। कई वरिष्ठ डेमोक्रेट सांसदों ने राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की असाधारण शक्तियां दिए जाने को लेकर चिंता जताई। यह मंजूरी ऐसे समय में मिली जब प्रतिनिधि सभा गुरुवार से जल्दी अवकाश पर जाने की तैयारी कर रही है। यदि बिल इसी सप्ताह पारित हो जाता है तो इसे कांग्रेस की अंतिम स्वीकृति मिल जाएगी।
बिल कब और किस राजनीतिक माहौल में आगे बढ़ा
यह कानून ऐसे समय में आगे बढ़ाया जा रहा है जब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा नौ नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद फिर से कार्य शुरू करने वाली है। वर्तमान सत्र के अंतिम दिनों में इस बिल को प्राथमिकता दी गई है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के अनुसार यदि बिल प्रतिनिधि सभा से पारित हो जाता है तो इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा सकता है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून बनने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इस समय राजनीतिक रूप से संवेदनशील माहौल में बिल को आगे बढ़ाना दोनों दलों के बीच मतभेदों को भी उजागर कर रहा है। कई सांसद राष्ट्रपति को इतनी व्यापक आर्थिक शक्ति दिए जाने को लेकर सतर्क हैं।
विरोध के बावजूद बिल की प्रक्रिया आगे बढ़ी
बिल को मंजूरी मिलने के बावजूद डेमोक्रेट खेमे में इसका व्यापक विरोध रहा। वरिष्ठ डेमोक्रेट सांसदों ने कहा कि राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की इतनी बड़ी ताकत देना संवैधानिक संतुलन के लिए उचित नहीं है। फिर भी दो डेमोक्रेट सदस्यों के समर्थन से बिल प्रक्रियात्मक बाधा पार कर गया। बुधवार को प्रतिनिधि सभा में इस बिल पर अंतिम मतदान होने की उम्मीद है। यदि बहुमत मिल जाता है तो बिल राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाएगा। विपक्षी सांसदों का तर्क है कि इस तरह के प्रावधान व्यापारिक साझेदार देशों के साथ संबंधों को जटिल बना सकते हैं तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
सीनेट से पहले मिली मंजूरी और बिल के प्रमुख प्रावधान
अमेरिकी सीनेट ने सात अगस्त को इस बिल को छियासी के मुकाबले ग्यारह वोटों के भारी बहुमत से पारित कर दिया था। बिल में रूस के नेतृत्व, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। इसके अलावा रूस के तथाकथित शैडो फ्लीट यानी उन जहाजों को भी निशाना बनाया जाएगा जिन पर मॉस्को को तेल शिपमेंट संबंधी मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने का आरोप है। बिल राष्ट्रपति को रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर सौ प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। सीनेट के संस्करण में व्यापारिक साझेदार देशों के नाम सीधे नहीं दिए गए हैं बल्कि मात्रा के हिसाब से पांच सबसे बड़े आयातक देशों का उल्लेख किया गया है।
भारत और चीन जैसे देशों पर संभावित प्रभाव
भारत और चीन उन देशों में शामिल हैं जिन्हें इस अतिरिक्त टैरिफ के दायरे में लाया जा सकता है। यदि कानून लागू होता है तो रूस से तेल और गैस खरीदने वाले इन देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर सौ प्रतिशत तक अतिरिक्त आयात शुल्क लग सकता है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा रूस से आयात करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रावधान लागू होता है तो भारतीय निर्यात पर अमेरिकी बाजार में दबाव बढ़ सकता है। व्यापारिक संबंधों और ऊर्जा सुरक्षा दोनों दृष्टियों से इस विकासक्रम पर नई दिल्ली में सतर्कता से नजर रखी जा रही है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में इससे नई अनिश्चितता पैदा होने की आशंका भी जताई जा रही है।