स्मार्टफोन आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके अत्यधिक उपयोग के दुष्प्रभाव अब वैज्ञानिक शोधों में भी स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार बार-बार सामाजिक माध्यमों पर सामग्री देखना, हर कुछ मिनट में फोन जांचना और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन पर प्रतिक्रिया देना मस्तिष्क में डोपामाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर के बार-बार स्राव को बढ़ावा देता है। यह रसायन आनंद और पुरस्कार की अनुभूति से जुड़ा होता है। जब यह प्रक्रिया लगातार दोहराई जाती है, तो मस्तिष्क धीरे-धीरे त्वरित संतुष्टि का आदी बनने लगता है। परिणामस्वरूप पढ़ाई, कार्यालय का कार्य, पुस्तक पढ़ना या अन्य सामान्य गतिविधियां अपेक्षाकृत कम रोचक महसूस होने लगती हैं क्योंकि उनमें तुरंत मिलने वाला मानसिक पुरस्कार उपलब्ध नहीं होता।
एकाग्रता, स्मरण शक्ति और निर्णय क्षमता पर पड़ सकता है प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार डिजिटल उत्तेजना के संपर्क में रहने से मस्तिष्क की ध्यान केंद्रित रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। अनेक शोधों में पाया गया है कि बार-बार फोन देखने की आदत कार्य के दौरान ध्यान भंग करती है और मस्तिष्क को लगातार एक कार्य से दूसरे कार्य की ओर स्थानांतरित होने के लिए मजबूर करती है। इससे गहन अध्ययन, विश्लेषणात्मक सोच, समस्या समाधान और निर्णय लेने जैसी क्षमताओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि यदि व्यक्ति लंबे समय तक इस प्रकार की आदतों में बना रहता है, तो उसकी उत्पादकता और मानसिक दक्षता में भी कमी आ सकती है। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि यह प्रभाव व्यक्ति की उम्र, उपयोग की अवधि और जीवनशैली जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करता है तथा प्रत्येक व्यक्ति में इसकी तीव्रता अलग-अलग हो सकती है।
सिर्फ दो सप्ताह के डिजिटल ब्रेक से दिखे सकारात्मक परिणाम
हार्वर्ड विश्वविद्यालय और PNAS Nexus से जुड़े एक अध्ययन में 467 प्रतिभागियों को दो सप्ताह तक अपने स्मार्टफोन पर इंटरनेट का उपयोग बंद रखने के लिए कहा गया। इस अवधि में केवल कॉल और संदेश जैसी आवश्यक सुविधाओं का उपयोग करने की अनुमति थी। अध्ययन के परिणामों में पाया गया कि प्रतिभागियों की एकाग्रता में उल्लेखनीय सुधार हुआ, तनाव और चिंता का स्तर कम हुआ, नींद की गुणवत्ता बेहतर हुई तथा अवसाद से जुड़े कुछ लक्षणों में भी कमी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि लगातार डिजिटल उत्तेजना से दूरी बनाने पर मस्तिष्क को पुनः संतुलित होने का अवसर मिलता है, जिससे उसकी कार्यक्षमता में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।
मस्तिष्क की ‘प्लास्टिसिटी’ देती है सुधार की उम्मीद
विशेषज्ञों के अनुसार मानव मस्तिष्क में ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ अर्थात स्वयं को परिस्थितियों के अनुरूप बदलने और नई आदतें विकसित करने की अद्भुत क्षमता होती है। यही कारण है कि यदि व्यक्ति धीरे-धीरे स्क्रीन समय कम करे और कम उत्तेजना वाली गतिविधियों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए, तो मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में सकारात्मक सुधार संभव है। नियमित पुस्तक पठन, प्रकृति के बीच सैर, संगीत सुनना, ध्यान एवं योग, परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना तथा रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेना मानसिक संतुलन और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है। विशेषज्ञ इस बात पर बल देते हैं कि डिजिटल संतुलन का अर्थ तकनीक से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उसका विवेकपूर्ण और नियंत्रित उपयोग करना है।
खराब नींद और स्मार्टफोन की लत का गहरा संबंध
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात तक स्क्रीन देखने से मस्तिष्क को पर्याप्त विश्राम नहीं मिल पाता। स्मार्टफोन की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित कर सकती है, जिससे नींद आने में कठिनाई होती है और नींद की गुणवत्ता भी घट सकती है। पर्याप्त और गहरी नींद न मिलने पर अगले दिन व्यक्ति अधिक थकान, चिड़चिड़ापन और मानसिक अस्थिरता महसूस कर सकता है। कई बार यही स्थिति तनाव कम करने के लिए फिर से अधिक स्मार्टफोन उपयोग की आदत को बढ़ावा देती है और यह एक दुष्चक्र का रूप ले लेती है। इसलिए विशेषज्ञ सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बनाने की सलाह देते हैं।
छोटी-छोटी आदतें दिला सकती हैं डिजिटल लत से राहत
विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग को केवल इच्छाशक्ति के भरोसे नियंत्रित करना कठिन हो सकता है, इसलिए व्यवहारिक रणनीतियां अपनाना अधिक प्रभावी होता है। अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना, स्क्रीन समय की नियमित निगरानी करना, भोजन के समय और परिवार के साथ रहते हुए फोन से दूरी बनाए रखना, सामाजिक माध्यमों से समय-समय पर छोटे विराम लेना तथा सोने से पहले मोबाइल को शयनकक्ष से बाहर रखना जैसी आदतें धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। यदि किसी व्यक्ति को यह महसूस हो कि स्मार्टफोन का उपयोग उसके दैनिक जीवन, पढ़ाई, काम, संबंधों या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, तो मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना उपयोगी हो सकता है। डिजिटल युग में तकनीक का संतुलित उपयोग ही स्वस्थ मस्तिष्क, बेहतर एकाग्रता और मानसिक संतुलन बनाए रखने का सबसे प्रभावी उपाय माना जा रहा है।