भोपाल. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित चार दिवसीय ब्रिक्स संस्कृति कार्यसमूह और संस्कृति मंत्रियों की बैठक में इस बार सांस्कृतिक सहयोग के साथ-साथ औपनिवेशिक काल तथा अवैध तस्करी के दौरान विदेश पहुंची सांस्कृतिक धरोहरों की स्वदेश वापसी का मुद्दा प्रमुखता से उभरा। भारत ने इस मंच पर स्पष्ट किया कि सांस्कृतिक विरासत केवल पुरातात्विक वस्तु नहीं, बल्कि किसी राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत निरंतरता का प्रतीक होती है। इसी व्यापक विमर्श के बीच धार की भोजशाला से जुड़ी वाग्देवी प्रतिमा की वापसी का प्रश्न भी राष्ट्रीय महत्व का विषय बनकर सामने आया है। यह मामला केवल एक प्रतिमा की वापसी तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि औपनिवेशिक दौर में भारत से बाहर ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों के पुनर्स्थापन की व्यापक पहल का हिस्सा बन चुका है।
राजा भोज की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है वाग्देवी प्रतिमा
धार का इतिहास परमार वंश के महान शासक राजा भोज की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार यह क्षेत्र कभी विद्या, दर्शन, साहित्य और शास्त्रार्थ का प्रमुख केंद्र रहा। भोजशाला को लंबे समय से ज्ञान और देवी सरस्वती की आराधना से जोड़कर देखा जाता रहा है। इसी परंपरा से संबंधित 11वीं शताब्दी की संगमरमर निर्मित वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान धार से बाहर चली गई और अंततः लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम के संग्रह का हिस्सा बन गई। वर्षों से विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग उठाई जाती रही है, जो अब नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है।
उच्च न्यायालय के आदेश के बाद तेज हुए राजनयिक प्रयास
मई 2026 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा भोजशाला-कमाल मौला परिसर को सरस्वती मंदिर मानते हुए केंद्र सरकार को वाग्देवी प्रतिमा की वापसी के लिए प्रयास करने संबंधी निर्देश दिए जाने के बाद इस अभियान को नई गति मिली। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार मध्य प्रदेश सरकार की ओर से इस संबंध में काफी पहले ही पहल की जा चुकी थी और उसके बाद से ब्रिटेन में भारतीय राजनयिक माध्यमों तथा संग्रहालय प्रशासन के साथ लगातार संवाद जारी है। केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने भी स्पष्ट किया है कि प्रतिमा की वापसी के लिए कई स्तरों पर औपचारिक पत्राचार किया जा चुका है। सरकार का प्रयास है कि अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग और राजनयिक संवाद के माध्यम से इस ऐतिहासिक धरोहर को सम्मानपूर्वक भारत वापस लाया जा सके।
प्रतिमा की पहचान को लेकर बना हुआ है ऐतिहासिक विवाद
वाग्देवी प्रतिमा की स्वदेश वापसी की राह केवल राजनयिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक और वैधानिक दृष्टि से भी जटिल मानी जा रही है। भारत इस प्रतिमा को भोजशाला की वाग्देवी अथवा देवी सरस्वती की प्रतिमा मानता है, जबकि ब्रिटिश म्यूजियम अपने अभिलेखों में इसे जैन परंपरा से संबंधित अंबिका की प्रतिमा के रूप में दर्ज करता है। संग्रहालय के अनुसार यह प्रतिमा वर्ष 1875 में धार क्षेत्र के अवशेषों से प्राप्त हुई थी और बाद में 1909 में इसे औपचारिक रूप से संग्रहालय के स्थायी संग्रह में शामिल किया गया। यही भिन्न ऐतिहासिक व्याख्याएं इस पूरे प्रकरण को कानूनी और कूटनीतिक रूप से अधिक जटिल बनाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल ऐतिहासिक दावे ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संबंधी कानून और संग्रहालयों की नीतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी में भारत का बढ़ा वैश्विक प्रभाव
पिछले एक दशक में भारत ने विदेशों में पहुंची अनेक दुर्लभ सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2014 के बाद विभिन्न देशों से लगभग 650 चोरी अथवा तस्करी कर ले जाई गई मूर्तियां, शिल्प और अन्य पुरावशेष भारत लौटाए जा चुके हैं, जबकि इससे पहले यह संख्या बेहद सीमित थी। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों ने भारतीय मंदिरों और पुरास्थलों से चोरी हुई दुर्लभ प्रतिमाओं की वापसी में सहयोग किया है। इसी अनुभव के आधार पर भारत अब वैश्विक मंचों पर सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा और उसकी मूल स्थान पर वापसी का मुद्दा अधिक प्रभावशाली ढंग से उठा रहा है।
ब्रिक्स मंच पर साझा विरासत संरक्षण की नई दिशा
भोपाल में आयोजित ब्रिक्स बैठक का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी तक सीमित नहीं है। सदस्य देशों के बीच सांस्कृतिक संस्थानों और कलाकारों का साझा डेटाबेस तैयार करना, प्राचीन पांडुलिपियों और पुरातात्विक अभिलेखों के संरक्षण को बढ़ावा देना तथा साझा सांस्कृतिक विरासत को UNESCO के समक्ष संयुक्त रूप से नामित करने जैसे महत्वपूर्ण विषय भी एजेंडे में शामिल हैं। फिर भी इस पूरे सम्मेलन के दौरान धार की वाग्देवी प्रतिमा सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले समय में भारत के राजनयिक प्रयास, न्यायिक निर्देश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इस बात का निर्धारण करेंगे कि एक शताब्दी से अधिक समय से लंदन में संरक्षित यह ऐतिहासिक प्रतिमा अपने मूल स्थान धार लौट पाती है या नहीं।