मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों के कई गांवों में इन दिनों जो दृश्य देखने को मिल रहे हैं, उन्होंने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। महिलाएं अपने बच्चों को गोद में लेकर लकड़ियों से बनी प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटी दिखाई दे रही हैं, जबकि ग्रामीण ‘न्याय दो या मार दो’ जैसे नारे लगाते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं। यह किसी अंतिम संस्कार का दृश्य नहीं, बल्कि ‘चिता आंदोलन’ के माध्यम से अपनी पीड़ा और आशंकाओं को व्यक्त करने का अनूठा और अहिंसक तरीका है। आंदोलनकारी कहना चाहते हैं कि यदि उनकी जमीन, जंगल और आजीविका उनसे छिन जाती है, तो उनके लिए यह जीवित रहते हुए मृत्यु के समान होगा।
क्या है ‘चिता आंदोलन’ और इसका उद्देश्य?
‘चिता आंदोलन’ पूरी तरह प्रतीकात्मक और शांतिपूर्ण विरोध का माध्यम है। इसमें परियोजना प्रभावित परिवार लकड़ियों से बनी चिताओं पर लेटकर यह संदेश देते हैं कि भूमि केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनके जीवन, संस्कृति, परंपरा और पहचान का आधार है। आंदोलन में विशेष रूप से आदिवासी महिलाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि वे विकास परियोजना का विरोध नहीं कर रही हैं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्वास, पर्याप्त मुआवजा और कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों की मांग कर रही हैं। आंदोलनकारियों का दावा है कि उनकी प्राथमिक मांग विकास और मानवीय अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
केन–बेतवा लिंक परियोजना से जुड़ा है पूरा विवाद
यह आंदोलन केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से प्रभावित क्षेत्रों में चल रहा है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संकट को कम करना, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना और पेयजल उपलब्धता बढ़ाना है। सरकार का कहना है कि इससे लाखों लोगों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा और क्षेत्र के कृषि तथा आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी। दूसरी ओर प्रभावित परिवारों का कहना है कि परियोजना के कारण उनकी कृषि भूमि, वन क्षेत्र और पारंपरिक आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इसी कारण विकास और विस्थापन के बीच संतुलन का प्रश्न इस आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बन गया है।
भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास को लेकर वर्षों से जारी है असंतोष
परियोजना प्रभावित गांवों में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और मुआवजे को लेकर लंबे समय से असंतोष बना हुआ है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने समय-समय पर अपनी आपत्तियां प्रशासन के सामने रखीं, लेकिन उनकी अनेक मांगों का समयबद्ध समाधान नहीं हो सका। आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्हें दिए गए कुछ आश्वासन अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं, जिसके कारण विरोध प्रदर्शन फिर तेज हो गया। वहीं प्रशासन का कहना है कि परियोजना से जुड़े पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार आगे बढ़ाई जा रही है।
आदिवासी महिलाओं की भागीदारी बनी आंदोलन की सबसे बड़ी पहचान
‘चिता आंदोलन’ में आदिवासी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने इसे विशेष पहचान दिलाई है। प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का कहना है कि उनके लिए जमीन केवल खेती का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। उनका मानना है कि यदि पुनर्वास की प्रक्रिया न्यायपूर्ण नहीं हुई तो उनकी पारंपरिक जीवनशैली और सामाजिक संरचना पर गहरा असर पड़ेगा। यही कारण है कि आंदोलन में महिलाओं की आवाज सबसे मुखर रूप में सामने आ रही है और यह विरोध केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चिंता का भी प्रतीक बन गया है।
सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद पर टिकी हैं उम्मीदें
वर्तमान में यह आंदोलन मुख्य रूप से छतरपुर और पन्ना जिलों के परियोजना प्रभावित गांवों में जारी है, जहां धरना, आमरण अनशन और प्रतीकात्मक चिता आंदोलन के माध्यम से अपनी मांगें रखी जा रही हैं। कई सामाजिक संगठनों ने भी प्रभावित परिवारों के समर्थन में आवाज उठाई है। दूसरी ओर सरकार लगातार यह दोहरा रही है कि केन–बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के दीर्घकालिक विकास और जल सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में अब सभी की नजर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संभावित संवाद और समाधान पर टिकी हुई है, क्योंकि यह मुद्दा केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं, बल्कि विकास, पर्यावरण, पुनर्वास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने की व्यापक चुनौती भी बन चुका है।