भोपाल, 8 सितंबर 2026 | मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2028 में अभी करीब दो साल का समय है, लेकिन प्रदेश की सियासत में चुनावी बिसात अभी से बिछने लगी है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में बड़ी हार झेल चुकी कांग्रेस ने इस बार उन विधानसभा क्षेत्रों पर सबसे पहले फोकस करने की रणनीति बनाई है, जहां उसका प्रदर्शन लंबे समय से कमजोर रहा है। पार्टी संगठन ने ऐसी करीब 70 सीटों की पहचान की है, जहां कांग्रेस कभी नहीं जीती या बहुत कम मौकों पर जीत हासिल कर सकी है। दूसरी तरफ बीजेपी भी ऐसी करीब 35 विधानसभा सीटों पर अलग रणनीति तैयार कर रही है, जहां पार्टी का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से कमजोर रहा है। यानी 2028 की लड़ाई में दोनों दल अपनी मजबूत सीटों से ज्यादा अब विरोधी दल के पुराने गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी कर रहे हैं।
2023 की हार के बाद कांग्रेस ने बदली रणनीति
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश की 230 सीटों में बीजेपी ने 163 सीटें, जबकि कांग्रेस ने केवल 66 सीटें जीती थीं। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़े भी यही संख्या दर्ज करते हैं। इसी परिणाम के बाद कांग्रेस संगठन ने कमजोर विधानसभा क्षेत्रों की अलग पहचान कर वहां लंबी अवधि की तैयारी शुरू करने का फैसला किया है। पार्टी का फोकस केवल उम्मीदवार घोषित करने या चुनाव के आखिरी महीनों में प्रचार करने के बजाय बूथ और मतदाता स्तर पर पहले से संगठन खड़ा करने पर है।
70 सीटों पर घर-घर पहुंचेंगे कांग्रेस कार्यकर्ता
प्रदेश कांग्रेस संगठन के मुताबिक चिह्नित 70 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे पहले मतदाता सूची के घर-घर सत्यापन का अभियान चलाया जाएगा। कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में मतदाताओं के नाम, मतदान केंद्र और संपर्क संबंधी संगठनात्मक जानकारी जुटाएंगे। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि किन बूथों पर पार्टी लगातार कमजोर रहती है और किन क्षेत्रों में नए या स्थानांतरित मतदाताओं से संपर्क बढ़ाने की जरूरत है। पार्टी संगठन ने इस अभियान को करीब छह महीने तक चलाने की तैयारी की है।
हालांकि मतदाता सूची में किसी नाम को जोड़ना, हटाना या संशोधित करना केवल निर्वाचन आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है। राजनीतिक दल अपने स्तर पर मतदाताओं से संपर्क और सूची का मिलान कर सकते हैं।
Govindpura कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल सीटों में
भोपाल की गोविंदपुरा विधानसभा सीट कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल सीटों के उदाहरणों में शामिल है। इस सीट पर बीजेपी का कब्जा 1980 से लगातार बना हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर 1980 से 2013 तक लगातार यहां से चुनाव जीतते रहे। 2018 और 2023 में उनकी बहू कृष्णा गौर ने बीजेपी का यह गढ़ बरकरार रखा। 2023 में कृष्णा गौर ने यहां एक लाख से ज्यादा मतों के बड़े अंतर से जीत हासिल की थी।
Rehli में 1985 से नहीं हारे गोपाल भार्गव
सागर जिले की रहली विधानसभा सीट भी कांग्रेस के लिए लंबे समय से बड़ी चुनौती है। बीजेपी के गोपाल भार्गव 1985 से लगातार इस सीट से जीतते आ रहे हैं। 2023 में उन्होंने नौवीं बार लगातार रहली से जीत दर्ज की। इस तरह रहली प्रदेश की उन सीटों में शामिल है, जहां कांग्रेस को केवल चुनावी अभियान नहीं बल्कि संगठनात्मक स्तर पर लंबी रणनीति की जरूरत होगी।
Indore-2 पर 1993 से BJP का कब्जा
इंदौर की विधानसभा सीट नंबर-2 भी बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक है। यह सीट 1993 से लगातार बीजेपी के पास है। पहले कैलाश विजयवर्गीय और बाद में रमेश मेंदोला ने यहां पार्टी का वर्चस्व कायम रखा। 2008 से रमेश मेंदोला लगातार इस सीट से विधायक चुने जा रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस की कमजोर सीटों की रणनीति में इंदौर के पुराने बीजेपी गढ़ खास महत्व रखते हैं।
19 सितंबर को राहुल गांधी का Indore कार्यक्रम
इस बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम प्रस्तावित है। पहले यह कार्यक्रम 12 सितंबर को होना था, लेकिन नेहरू स्टेडियम की अनुमति नहीं मिलने के बाद इसे एक सप्ताह आगे बढ़ाया गया। कार्यक्रम में राहुल गांधी विद्यार्थियों और युवाओं से शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर संवाद करेंगे। हालांकि 7 सितंबर तक कार्यक्रम स्थल को लेकर अंतिम स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। कांग्रेस की ओर से अलग-अलग स्थानों पर चर्चा हुई है और बड़ी संख्या में छात्रों के रजिस्ट्रेशन का दावा किया गया है। इसलिए फिलहाल 19 सितंबर की तारीख को प्रस्तावित कार्यक्रम के रूप में ही लिखना ज्यादा सुरक्षित है।
Rahul के दौरे के बाद कमजोर सीटों पर बढ़ेगा फोकस
कांग्रेस की रणनीति राहुल गांधी के युवा संवाद के बाद संगठनात्मक अभियान को और तेज करने की है। कमजोर सीटों पर बूथवार मतदाता स्थिति, सामाजिक समीकरण, पुराने चुनाव परिणाम और स्थानीय नेतृत्व की ताकत का आकलन किया जाएगा। पार्टी यह भी जानने की कोशिश करेगी कि पिछले चुनावों में किन बूथों पर लगातार हार हुई और इसके पीछे उम्मीदवार, संगठन, स्थानीय मुद्दे या सामाजिक समीकरण में से कौन-सा कारण प्रमुख रहा।
BJP भी 35 कठिन सीटों के लिए बना रही Micro Plan
कांग्रेस ही नहीं, बीजेपी ने भी अपने कमजोर क्षेत्रों पर अलग नजर रखी है। पार्टी स्तर पर ऐसी करीब 35 सीटों की पहचान की गई है, जहां जनसंघ-बीजेपी के दौर से पार्टी बहुत कम बार जीती है या जहां कांग्रेस का मजबूत आधार रहा है। इन सीटों में बड़े नेताओं और मंत्रियों को जिम्मेदारी देने, गांवों के छोटे क्लस्टर बनाने और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने की रणनीति सामने आई है। बीजेपी पहले भी बूथ स्तर पर 51 प्रतिशत वोट शेयर के लक्ष्य को अपनी संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा बना चुकी है।
Raghogarh BJP के लिए सबसे कठिन गढ़ों में
गुना जिले की राघौगढ़ विधानसभा सीट दशकों से कांग्रेस और दिग्विजय सिंह परिवार का मजबूत गढ़ रही है। 1977 से इस सीट पर दिग्विजय सिंह परिवार या उनसे जुड़े कांग्रेस उम्मीदवारों का दबदबा रहा है। वर्तमान में जयवर्धन सिंह यहां से विधायक हैं। बीजेपी के लिए इस तरह की सीटों पर केवल चुनाव के समय सक्रिय होने के बजाय लंबी अवधि के संगठनात्मक विस्तार की जरूरत होगी।
Churhat में BJP सिर्फ दो बार जीती
सीधी जिले की चुरहट विधानसभा सीट भी बीजेपी की कठिन सीटों में गिनी जाती है। उपलब्ध चुनावी इतिहास के मुताबिक 1977 से अब तक हुए सामान्य विधानसभा चुनावों में बीजेपी यहां केवल 1993 और 2018 में जीत सकी है। बाकी अधिकांश चुनाव कांग्रेस ने जीते हैं। 2023 में यहां कांग्रेस के अजय सिंह ने फिर जीत दर्ज की।
Bhopal North में 1998 से Congress
राजधानी की भोपाल उत्तर विधानसभा सीट भी बीजेपी के लिए चुनौती रही है। 1998 से यहां कांग्रेस का लगातार प्रभाव बना हुआ है। लंबे समय तक आरिफ अकील इस सीट से विधायक रहे और 2023 में उनके बेटे आतिफ आरिफ अकील ने कांग्रेस के लिए सीट बरकरार रखी।
Kasrawad-Rajpur में भी Congress मजबूत
खरगोन की कसरावद सीट पर कांग्रेस के सचिन यादव 2013, 2018 और 2023 के चुनाव जीत चुके हैं। वहीं बड़वानी जिले की राजपुर सीट से कांग्रेस के बाला बच्चन ने 2013, 2018 और 2023 में लगातार जीत दर्ज की है। ऐसी सीटों को बीजेपी अपने संगठन विस्तार की कठिन चुनौती के रूप में देख रही है।
BJP का फोकस Panna Pramukh और Booth Management पर
बीजेपी की चुनावी रणनीति में बूथ स्तर का संगठन महत्वपूर्ण रहा है। पार्टी पन्ना प्रमुखों, बूथ कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के जरिए मतदाताओं से लगातार संपर्क बनाए रखने पर जोर देती रही है। 2028 की तैयारी में कमजोर सीटों पर सामाजिक समीकरण, सरकारी योजनाओं की पहुंच, स्थानीय नाराजगी और संगठन की कमियों का अलग-अलग आकलन किए जाने की योजना है। जहां पार्टी लंबे समय से नहीं जीत पाई है, वहां पास की सीटों के विधायक, मंत्री और वरिष्ठ नेताओं को भी संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
कांग्रेस का मुकाबला सीट नहीं, इतिहास बदलने का
कांग्रेस के सामने चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि उसकी 70 कमजोर सीटों में कई ऐसी हैं जहां पूरी नई पीढ़ी ने कांग्रेस विधायक देखा ही नहीं है। गोविंदपुरा में चार दशक से ज्यादा और रहली में करीब चार दशक से बीजेपी का लगातार प्रभाव इसका उदाहरण है। ऐसे में कांग्रेस के लिए केवल प्रत्याशी बदलने से ज्यादा जरूरी स्थानीय संगठन, बूथ नेटवर्क और मतदाताओं के साथ लंबे समय का संपर्क मजबूत करना होगा।
2028 में मुकाबला होगा Stronghold vs Stronghold
मध्यप्रदेश की 2028 की लड़ाई में एक दिलचस्प तस्वीर अभी से बन रही है। कांग्रेस उन सीटों पर काम शुरू कर रही है जिन्हें लंबे समय से BJP का अभेद्य गढ़ माना जाता रहा है, जबकि बीजेपी राघौगढ़, चुरहट और भोपाल उत्तर जैसी कांग्रेस की मजबूत सीटों में अपनी जमीन बढ़ाना चाहती है। यानी अगले दो साल में प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुकाबला केवल मौजूदा विधायकों की सीट बचाने का नहीं, बल्कि विरोधी दल के परंपरागत गढ़ तोड़ने का भी होगा।