नई दिल्ली: किसी बच्चे के हाथ में पहली बार पेंसिल आना और कागज पर अक्षर लिखने की कोशिश करना भले ही एक छोटी घटना लगे, लेकिन यहीं से ज्ञान की एक नई यात्रा शुरू होती है। अक्षरों की पहचान शब्दों की समझ में बदलती है और शब्द विचारों को जन्म देते हैं। यही विचार व्यक्ति को बेहतर निर्णय लेने, अपने अधिकारों को समझने और आत्मनिर्भर बनने की क्षमता देते हैं। हर साल 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को के अनुसार यह दिवस 1967 से दुनिया भर में मनाया जा रहा है। वर्ष 2026 में इसकी 60वीं वर्षगांठ है। इस वर्ष की थीम “Literacy for people, the planet and prosperity” रखी गई है।
अब सिर्फ पढ़ना-लिखना नहीं है साक्षरता
बदलती दुनिया में साक्षरता का अर्थ केवल अक्षरों और शब्दों को पढ़ना-लिखना नहीं रह गया है। आज जरूरी है कि व्यक्ति सूचना को समझ सके, सही और गलत में अंतर कर सके तथा प्राप्त जानकारी के आधार पर सही निर्णय ले सके। बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सेवाओं, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने साक्षरता को नए आयाम दिए हैं। अब डिजिटल, वित्तीय, स्वास्थ्य और मीडिया साक्षरता भी आधुनिक जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी हैं।
दुनिया में अभी भी बड़ी आबादी बुनियादी साक्षरता से दूर
वैश्विक स्तर पर साक्षरता में दशकों के दौरान उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। UNESCO के अनुसार 2024 में दुनिया में कम से कम 739 मिलियन युवा और वयस्क बुनियादी साक्षरता कौशल से वंचित थे। साथ ही, 2023 में 272 मिलियन बच्चे और किशोर स्कूल से बाहर थे। UUNESCO ये आंकड़े बताते हैं कि सार्वभौमिक साक्षरता का लक्ष्य अभी भी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है।
महिला साक्षरता पर विशेष ध्यान जरूरी
साक्षरता की चुनौती का सबसे बड़ा असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है। महिला शिक्षा का लाभ केवल महिला तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरे परिवार और अगली पीढ़ी पर पड़ता है। शिक्षित महिला बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और परिवार से जुड़े फैसलों में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती है। इसलिए महिला साक्षरता को सामाजिक और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
भारत में साक्षरता की यात्रा
स्वतंत्रता के समय भारत के सामने शिक्षा की पहुंच बढ़ाना बड़ी चुनौती थी। गरीबी, सामाजिक असमानता, ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित संसाधन और महिलाओं की कम शैक्षिक भागीदारी जैसी समस्याओं ने इस चुनौती को और गंभीर बनाया। दशकों के दौरान स्कूलों का विस्तार, शिक्षा के अधिकार, वयस्क शिक्षा कार्यक्रम और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने जैसी पहलों से स्थिति में बदलाव आया है। हालांकि, राज्यों, ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता में अंतर अब भी चुनौती बना हुआ है।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर
शहरी क्षेत्रों में स्कूलों, इंटरनेट, पुस्तकालयों और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर है। दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की दूरी, शिक्षकों की उपलब्धता, आर्थिक परिस्थितियां और डिजिटल संसाधनों की कमी शिक्षा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए साक्षरता बढ़ाने के लिए केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, डिजिटल पहुंच और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप शिक्षण पर भी ध्यान देना जरूरी है।
डिजिटल युग में डिजिटल साक्षरता बनी जरूरत
मोबाइल और इंटरनेट ने जानकारी तक पहुंच को आसान बनाया है। लेकिन डिजिटल उपकरण चलाना और डिजिटल रूप से साक्षर होना अलग-अलग बातें हैं। एक व्यक्ति को स्मार्टफोन चलाना आता हो, लेकिन अगर वह फर्जी लिंक, ऑनलाइन धोखाधड़ी या गलत सूचना को पहचान नहीं पाता, तो उसकी डिजिटल समझ अधूरी मानी जाएगी। इसलिए डिजिटल साक्षरता में तकनीक का इस्तेमाल करने के साथ-साथ ऑनलाइन सुरक्षा, गोपनीयता, सूचना की जांच और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार भी शामिल होना चाहिए।
फेक न्यूज के दौर में मीडिया साक्षरता जरूरी
सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार को बेहद तेज कर दिया है। लेकिन इसके साथ गलत सूचना और फेक न्यूज की चुनौती भी बढ़ी है। ऐसे में किसी खबर को सच मानने से पहले उसके स्रोत, तारीख और प्रमाण की जांच करना जरूरी है। अन्य विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करना भी मीडिया साक्षरता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यानी आधुनिक साक्षरता का मतलब केवल पढ़ना नहीं, बल्कि पढ़ी हुई जानकारी पर सवाल करना और उसकी विश्वसनीयता परखना भी है।
वित्तीय साक्षरता से मजबूत होगी आर्थिक समझ
बैंक खाता चलाना, डिजिटल भुगतान करना, ऋण की शर्तों को समझना, बीमा और बचत के महत्व को जानना आज हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। खासकर किसान, छोटे कारोबारी, श्रमिक और महिलाएं वित्तीय साक्षरता के माध्यम से बैंकिंग और सरकारी वित्तीय सुविधाओं का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। डिजिटल भुगतान के विस्तार के साथ वित्तीय साक्षरता का महत्व और बढ़ गया है, क्योंकि जानकारी की कमी ऑनलाइन धोखाधड़ी का जोखिम बढ़ा सकती है।
AI के दौर में साक्षरता का नया अध्याय
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शिक्षा और ज्ञान की दुनिया में बड़ा बदलाव शुरू किया है। AI अब सवालों के जवाब देने, लेख तैयार करने, अनुवाद करने और जानकारी को अलग-अलग रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम है। लेकिन AI से मिली हर जानकारी सही हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए आने वाले समय में AI साक्षरता भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। UNESCO भी AI शिक्षा में मानव-केंद्रित दृष्टिकोण, नैतिकता, आलोचनात्मक सोच और जिम्मेदार इस्तेमाल पर जोर देता है। उसके AI Competency Framework for Students में मानव-केंद्रित सोच, AI नैतिकता, AI तकनीक और सिस्टम डिजाइन जैसी क्षमताओं को शामिल किया गया है।
साक्षरता और स्वास्थ्य का भी गहरा संबंध
दवा के निर्देश समझना, डॉक्टर की सलाह पढ़ना, पोषण संबंधी जानकारी समझना और स्वास्थ्य से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी पहचानना स्वास्थ्य साक्षरता का हिस्सा है। गलत स्वास्थ्य जानकारी तेजी से फैलने के दौर में यह क्षमता और महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए स्वास्थ्य साक्षरता को भी व्यापक शिक्षा का हिस्सा बनाए जाने की जरूरत है।
वयस्क शिक्षा अभी भी जरूरी
बचपन में स्कूल से दूर रह जाना सीखने की संभावनाओं को खत्म नहीं करता। वयस्कों को पढ़ने-लिखने और जीवन कौशल से जोड़ना भी साक्षरता अभियान का अहम हिस्सा है। भारत में वयस्क शिक्षा के लिए ULLAS-नव भारत साक्षरता कार्यक्रम जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान के साथ जीवन कौशल, बुनियादी शिक्षा, व्यावसायिक कौशल और सतत शिक्षा को बढ़ावा देना है।
मातृभाषा में शिक्षा से बढ़ सकती है सीखने की क्षमता
भारत जैसे बहुभाषी देश में मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं में शुरुआती शिक्षा का विशेष महत्व है। जिस भाषा में बच्चा घर और समाज में बातचीत करता है, उसी भाषा में शुरुआती अवधारणाओं को समझना उसके लिए आसान हो सकता है। डिजिटल तकनीक ने अलग-अलग भाषाओं में शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने की संभावनाएं भी बढ़ाई हैं।
साक्षरता और लोकतंत्र का मजबूत रिश्ता
एक जागरूक लोकतंत्र के लिए नागरिकों का शिक्षित और सूचनासंपन्न होना जरूरी है। अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझना, सरकारी नीतियों को पढ़ना और सार्वजनिक मुद्दों पर राय बनाना साक्षरता से जुड़ा है। आज सोशल मीडिया के दौर में नागरिकों के लिए सूचना की सत्यता परखने और आलोचनात्मक सोच विकसित करने की जरूरत पहले से अधिक है।
अब चुनौती सिर्फ स्कूल पहुंचाने की नहीं, सीखने की भी
दुनिया के सामने अब चुनौती केवल बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि वे वास्तव में पढ़ना, लिखना और गणना करना सीखें। UNESCO के अनुसार 2023 में दुनिया में 272 मिलियन बच्चे और किशोर स्कूल से बाहर थे और चार में से करीब एक बच्चा न्यूनतम पढ़ने की दक्षता हासिल नहीं कर पा रहा था। UUNESCO इसलिए शिक्षा नीति में नामांकन के साथ सीखने के वास्तविक परिणामों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
साक्षरता से ज्ञान समाज की ओर
साक्षरता की शुरुआत अक्षर पहचानने से होती है, लेकिन इसका अंतिम लक्ष्य व्यक्ति को ज्ञान, विवेक, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता प्रदान करना है। आज साक्षर होने का अर्थ किताब पढ़ पाने के साथ-साथ डिजिटल दुनिया को समझना, फेक न्यूज पहचानना, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेना और AI जैसी नई तकनीकों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना भी है। अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2026 की 60वीं वर्षगांठ इस बात को याद दिलाती है कि साक्षरता केवल शिक्षा का विषय नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और पूरी अर्थव्यवस्था को बदलने की शक्ति है। आने वाले समय में दुनिया को ऐसी साक्षरता की जरूरत होगी जो लोगों को केवल पढ़ना-लिखना न सिखाए, बल्कि उन्हें बदलती दुनिया को समझने और उसमें सम्मान के साथ आगे बढ़ने का हुनर भी दे। इस संस्करण में आपके मूल लेख की प्रमुख बातें बरकरार रखते हुए भाषा को न्यूज़-फीचर शैली में रखा गया है और 2026 के लिए UNESCO के ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वैश्विक आंकड़ों को अपडेट किया गया है।