नई दिल्ली: भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अंडमान सागर में प्राकृतिक गैस की संभावित खोज के बाद अब देश के पूर्वी तट पर तेल और गैस के नए भंडारों की तलाश के लिए एक महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और कच्चे तेल व गैस के आयात पर होने वाले भारी खर्च को घटाना है।
विदेशी निर्भरता कम करने पर फोकस
भारत वर्तमान में अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे हर साल पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। इसी निर्भरता को कम करने के लिए सरकार अब समुद्र के भीतर छिपे हाइड्रोकार्बन संसाधनों की खोज पर जोर दे रही है।
महत्वपूर्ण बेसिनों पर नजर
जानकारी के अनुसार, अंडमान सागर में संभावित गैस खोज के बाद अब सरकार का ध्यान महानदी, बंगाल-पुर्णिया, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिन जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित हो गया है। माना जा रहा है कि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर तेल और गैस के भंडार मौजूद हो सकते हैं, जिनकी खोज से देश की ऊर्जा तस्वीर बदल सकती है।
36 महीने का हाईटेक सिस्मिक सर्वे अभियान
सरकार ने इस मिशन के लिए वैश्विक जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएं आमंत्रित की हैं। इसके तहत पुराने सिस्मिक डेटा का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा और आधुनिक ब्रॉडबैंड 3D सिस्मिक सर्वे तकनीक का उपयोग किया जाएगा। यह पूरा अभियान करीब 36 महीनों तक चलेगा, जिसमें समुद्र की गहराई में छिपी भू-आकृतिक संरचनाओं का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।
समुद्र की गहराई में हाईटेक खोज
विशेष जहाज साउंड वेव्स भेजकर समुद्र तल के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक मौजूद परतों का डेटा जुटाएंगे। इस डेटा के विश्लेषण से वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि किन क्षेत्रों में तेल और गैस के संभावित भंडार मौजूद हैं।
कृष्णा-गोदावरी बेसिन पर सबसे बड़ी उम्मीद
कृष्णा-गोदावरी बेसिन को इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा रहा है। यह पहले से ही भारत के प्रमुख प्राकृतिक गैस उत्पादन क्षेत्रों में शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्याधुनिक सिस्मिक इमेजिंग तकनीक की मदद से यहां गहरे स्तर पर नए तेल और गैस भंडारों की खोज की संभावना बढ़ सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा बड़ा बल
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार यह मिशन केवल संसाधन खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध देश की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा से भी है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण वैश्विक तेल कीमतों में आए उतार-चढ़ाव ने भारत की ऊर्जा प्रणाली को प्रभावित किया है। यदि देश के भीतर बड़े पैमाने पर नए तेल और गैस भंडार मिलते हैं, तो भविष्य में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की आपूर्ति अधिक स्थिर हो सकती है। साथ ही यह कदम भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा परिवर्तनकारी प्रयास माना जा रहा है।