भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार ऊर्जा आत्मनिर्भरता और कार्बन उत्सर्जन में कमी की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि सीमा से सटे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में स्थापित हो रही ऐसी परियोजनाओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता भी बढ़ाई है। इसी परिप्रेक्ष्य में गृह मंत्रालय ने नई सुरक्षा गाइडलाइन जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना अब केवल आर्थिक या तकनीकी मानकों के आधार पर नहीं, बल्कि सुरक्षा मूल्यांकन के बाद ही संभव होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक ऊर्जा परियोजनाओं में लगे सेंसर, निगरानी उपकरण, संचार प्रणालियां और उच्च क्षमता वाले डिजिटल नेटवर्क रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील हो सकते हैं। इसलिए सीमा क्षेत्रों में इनकी स्थापना के लिए अतिरिक्त सतर्कता आवश्यक मानी गई है।
एक किलोमीटर के भीतर पूरी तरह प्रतिबंध, 50 किलोमीटर तक सुरक्षा जांच अनिवार्य
गृह मंत्रालय की नई व्यवस्था के अनुसार नियंत्रण रेखा, वास्तविक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा से एक किलोमीटर तक के क्षेत्र में किसी भी नए सौर, पवन अथवा हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना को अनुमति नहीं दी जाएगी। यह प्रावधान देश की सीमाओं के सबसे संवेदनशील हिस्सों को ध्यान में रखते हुए लागू किया गया है।
इसके अलावा सीमा से एक से पचास किलोमीटर तक के पूरे क्षेत्र को सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माना गया है। इस दायरे में प्रस्तावित प्रत्येक परियोजना को गृह मंत्रालय की विस्तृत सुरक्षा जांच और मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होगा। परियोजना की भौगोलिक स्थिति, तकनीकी ढांचा, निगरानी व्यवस्था और संचालन प्रणाली का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाएगा।
रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के बिना नहीं मिल सकेगी अनुमति
नई गाइडलाइन में गृह मंत्रालय के साथ रक्षा मंत्रालय की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनाई गई है। अंतरराष्ट्रीय सीमा से बीस किलोमीटर तक प्रस्तावित प्रत्येक परियोजना के लिए रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होगा। इसके बाद ही संबंधित परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति मिल सकेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सीमा क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियां, रणनीतिक प्रतिष्ठान और निगरानी तंत्र पहले से सक्रिय रहते हैं। ऐसे में किसी भी बड़े ऊर्जा संयंत्र का प्रभाव सैन्य संचालन, रडार प्रणाली अथवा सुरक्षा निगरानी पर न पड़े, इसे सुनिश्चित करना आवश्यक माना गया है।
विदेशी नागरिकों की नियुक्ति पर भी कड़े प्रतिबंध
गृह मंत्रालय ने परियोजनाओं में कार्यरत मानव संसाधन को लेकर भी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नई व्यवस्था के तहत चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों के इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों, कर्मचारियों और श्रमिकों की नियुक्ति बिना केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के नहीं की जा सकेगी।
सरकार का मानना है कि सीमा क्षेत्रों में कार्यरत परियोजनाओं में विदेशी नागरिकों की मौजूदगी सुरक्षा जोखिम उत्पन्न कर सकती है। इसलिए परियोजना संचालकों को नियुक्ति से पहले विस्तृत सुरक्षा सत्यापन और आवश्यक सरकारी स्वीकृति प्राप्त करनी होगी। इससे संवेदनशील क्षेत्रों में मानव संसाधन प्रबंधन भी अधिक नियंत्रित और सुरक्षित बनाया जा सकेगा।
ऊर्जा क्षेत्र पर क्या होगा प्रभाव और आगे की राह
नई गाइडलाइन का प्रभाव विशेष रूप से उन राज्यों पर पड़ सकता है जहां सीमा से सटे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की योजना बनाई जा रही है। परियोजना डेवलपर्स को अब भूमि चयन, निवेश योजना और निर्माण कार्यक्रम तैयार करते समय सुरक्षा संबंधी मानकों को भी समान महत्व देना होगा। इससे कुछ परियोजनाओं की मंजूरी प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन सरकार का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
ऊर्जा और सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत जिस गति से हरित ऊर्जा क्षमता बढ़ा रहा है, उसके समानांतर रणनीतिक अवसंरचना की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। नई गाइडलाइन इसी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीति कदम मानी जा रही है, जो भविष्य में सीमा क्षेत्रों में विकसित होने वाली परियोजनाओं के लिए नया मानक स्थापित करेगी।