नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात शुल्क में संशोधन किया है। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार डीजल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को 8.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 15.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसी प्रकार विमान ईंधन अर्थात एटीएफ के निर्यात पर यह शुल्क 7.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 14.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। सरकार का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए यह कदम घरेलू ऊर्जा सुरक्षा और बाजार संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
पेट्रोल निर्यात शुल्क में कटौती से मिली आंशिक राहत
जहां डीजल और एटीएफ पर शुल्क बढ़ाया गया है, वहीं पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में कमी की गई है। सरकार ने पेट्रोल पर निर्यात शुल्क 4 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग, घरेलू आपूर्ति और निर्यात प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा है। हालांकि घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर लागू मौजूदा कर व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर तत्काल प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
पश्चिम एशिया संकट से ऊर्जा बाजार पर बढ़ा दबाव
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के तेल और गैस परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है, जहां से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और आपूर्ति बाधित होने की आशंका लगातार बनी हुई है। ऐसे माहौल में ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए मूल्य स्थिरता बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।
विंडफॉल टैक्स का उद्देश्य क्या है?
विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, जिसे सामान्य रूप से विंडफॉल टैक्स कहा जाता है, तब लगाया जाता है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल या पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में अचानक वृद्धि के कारण कंपनियों को असामान्य लाभ होने लगता है। सरकार इस अतिरिक्त लाभ का एक हिस्सा कर के रूप में प्राप्त करती है, ताकि घरेलू बाजार में आवश्यक ईंधन की उपलब्धता बनी रहे और निर्यात के कारण देश के भीतर आपूर्ति प्रभावित न हो। इसके साथ ही यह व्यवस्था मूल्य असंतुलन को नियंत्रित करने और ऊर्जा क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने का भी माध्यम मानी जाती है।
हर पखवाड़े होती है शुल्क दरों की समीक्षा
सरकार पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर इन शुल्कों की नियमित समीक्षा कर रही है। मार्च में डीजल और एटीएफ के निर्यात पर शुल्क लागू किए जाने के बाद से प्रत्येक पखवाड़े दरों में संशोधन किया जा रहा है। बाद में पेट्रोल के निर्यात को भी इस व्यवस्था के दायरे में शामिल किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार बदलते हालात को देखते हुए भविष्य में भी शुल्क दरों में परिस्थितियों के अनुसार बदलाव संभव है।
ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई पर रहेगी नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है। इसका असर परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और महंगाई पर भी पड़ सकता है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता घरेलू ईंधन आपूर्ति को सुरक्षित रखना, मूल्य स्थिरता बनाए रखना और ऊर्जा क्षेत्र में किसी प्रकार की कमी नहीं आने देना होगी। आने वाले दिनों में वैश्विक घटनाक्रम और कच्चे तेल की कीमतों के आधार पर सरकार की कर नीति में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।