नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan ने गुरुवार को ‘संविधान हत्या दिवस’ के अवसर पर 1975 के आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक ऐसा दौर था, जब संवैधानिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रताओं की कड़ी परीक्षा हुई थी। उपराष्ट्रपति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जारी अपने संदेश में कहा कि वह उन सभी बहादुर लोगों को नमन करते हैं, जिन्होंने 1975 में घोषित आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवाज उठाई और संविधान की भावना को जीवित बनाए रखा।
उन्होंने कहा कि आपातकाल का दौर यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए निरंतर सजग रहना कितना आवश्यक है। उस समय नागरिक स्वतंत्रताओं को निलंबित कर दिया गया था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया था और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयास किए गए थे। उपराष्ट्रपति ने देशवासियों से संविधान के मूल आदर्शों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का आह्वान करते हुए कहा कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित भारत के निर्माण के लिए सभी को मिलकर कार्य करना चाहिए।
देशभर में मनाया जा रहा संविधान हत्या दिवस
इस अवसर पर Bharatiya Janata Party देश के विभिन्न राज्यों में ‘संविधान हत्या दिवस’ के तहत कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से 25 जून 1975 को लागू किए गए आपातकाल के प्रभावों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़े असर को याद किया जा रहा है।
21 महीने तक लागू रहा था आपातकाल
गौरतलब है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi द्वारा 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू किया गया था, जो 21 मार्च 1977 तक प्रभावी रहा। लगभग 21 महीनों तक चले इस दौर में कई नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए और इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक माना जाता है। राजनीतिक और संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सीख रहा है, जिसने संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा के महत्व को और अधिक मजबूत किया।