नई दिल्ली. इस मानसून में राजधानी दिल्ली में सामान्य से बेहतर बारिश दर्ज की गई। 16 सितंबर तक दिल्ली में सामान्य से 8% ज्यादा वर्षा हो चुकी है। यह आंकड़ा तब सामने आया जब इसके मौसम संबंधी सब-डिविजन हरियाणा में 23% और पूरे उत्तर-पश्चिम भारत क्षेत्र में 10% कम बारिश दर्ज की गई। जिले-वार बारिश के आंकड़े देखने से पता चलता है कि दिल्ली इस साल अच्छे मानसून वाले इलाके की सीमा पर स्थित रही। आसपास के कई जिलों में बारिश काफी कम हुई जबकि राजधानी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रही। यह असमान पैटर्न मौसम विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय बन गया है।
आसपास के जिलों में भारी कमी
राजधानी के ठीक उत्तर में कम बारिश वाले जिलों का एक बड़ा क्षेत्र है। पड़ोसी सोनीपत में 32% और रोहतक में 47% कम बारिश हुई। पंजाब में होशियारपुर में 53% तथा कपूरथला में 69% की भारी कमी दर्ज की गई। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 30 से ज्यादा ऐसे जिले हैं जहां बारिश सामान्य से काफी कम हुई। इन क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात की आशंका बढ़ गई है। दिल्ली के आसपास का यह व्यापक कम वर्षा वाला इलाका राजधानी की बेहतर बारिश को और अधिक उल्लेखनीय बनाता है। क्षेत्रीय स्तर पर वर्षा वितरण में यह बड़ा अंतर साफ दिखाई दे रहा है।
कम दबाव वाले सिस्टम की बदली दिशा
दिल्ली में अपेक्षाकृत अच्छी बारिश का कारण बंगाल की खाड़ी से आने वाले कम दबाव वाले सिस्टम की दिशा में बदलाव माना जा रहा है। इस सीजन में इन सिस्टम ने अपनी सामान्य राह बदल दी और पश्चिमी विक्षोभ के साथ मिलकर दिल्ली-एनसीआर में बारिश कराने में मदद की। उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में मानसून की ज्यादातर बारिश इन्हीं नमी वाले कम दबाव वाले सिस्टम से होती है। इनमें बंगाल की खाड़ी से जमीन की ओर बढ़ने वाले डिप्रेशन भी शामिल हैं। इस बार इन सिस्टम की सक्रियता और दिशा ने दिल्ली को फायदा पहुंचाया जबकि आसपास के कई इलाके इससे वंचित रह गए।
अल नीनो का अप्रत्याशित प्रभाव
आमतौर पर अल नीनो वाले सालों में मानसून कमजोर रहने की आशंका रहती है लेकिन इस बार का पैटर्न अलग रहा। क्लाइमेट डायनामिक्स में 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 1979 से 2020 के दौरान अल नीनो वाले सालों में बंगाल की खाड़ी में डिप्रेशन की संख्या बढ़ गई थी। सामान्य सालों में जुलाई-अगस्त के दौरान इनकी औसत संख्या 2.4 थी जबकि अल नीनो वाले सालों में यह 3.9 हो गई। इस बार भी मजबूत होते अल नीनो के बावजूद दिल्ली में अच्छी बारिश हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो और जलवायु परिवर्तन दोनों ने मिलकर इस असामान्य पैटर्न में भूमिका निभाई हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चुनौती
इस मौसम में बारिश का अजीब पैटर्न जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को भी रेखांकित करता है। दिल्ली जैसे महानगर में अच्छी बारिश होने के बावजूद आसपास के कृषि प्रधान क्षेत्रों में कमी से फसलों पर असर पड़ने की आशंका है। मौसम वैज्ञानिक लगातार निगरानी कर रहे हैं कि आने वाले वर्षों में अल नीनो और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त प्रभाव मानसून पैटर्न को कैसे प्रभावित करेगा। क्षेत्रीय असमानता बढ़ने से जल प्रबंधन और कृषि योजनाओं में नए सिरे से सोचने की जरूरत पैदा हो गई है। दिल्ली की बेहतर बारिश राहत भरी है लेकिन व्यापक क्षेत्र में कमी चिंता का विषय बनी हुई है।