दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण एक बार फिर गंभीर चर्चा का विषय बन गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार राजधानी का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 294 दर्ज किया गया, जो लगातार दूसरे दिन 'खराब' श्रेणी में बना रहा। सामान्यतः जुलाई के महीने में मानसूनी वर्षा और तेज हवाओं के कारण वातावरण में मौजूद प्रदूषक कण कम हो जाते हैं और वायु गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है, लेकिन इस बार स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम संबंधी परिस्थितियों और बाहरी स्रोतों से आने वाली धूल ने प्रदूषण के स्तर को अचानक बढ़ा दिया है, जिससे लोगों की चिंता बढ़ गई है।
वायु गुणवत्ता सूचकांक क्या बताता है और इसका स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ता है
वायु गुणवत्ता सूचकांक किसी क्षेत्र की हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों की मात्रा को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण मानक है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार शून्य से 50 के बीच का सूचकांक 'अच्छा', 51 से 100 'संतोषजनक', 101 से 200 'मध्यम', 201 से 300 'खराब', 301 से 400 'बहुत खराब' तथा 401 से 500 के बीच 'गंभीर' श्रेणी माना जाता है। वर्तमान स्तर यह संकेत देता है कि संवेदनशील वर्गों के साथ-साथ सामान्य नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने से श्वसन संबंधी समस्याएं, एलर्जी और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।
सीमा पार से आ रही धूल बनी प्रमुख वजह, मौसम वैज्ञानिकों की बढ़ी निगरानी
विशेषज्ञों के अनुसार इस बार दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने के पीछे सीमा पार से आने वाली धूल एक प्रमुख कारण बनकर सामने आई है। वातावरण में मौजूद सूक्ष्म धूल कण हवाओं के साथ राजधानी क्षेत्र तक पहुंच रहे हैं, जिससे हवा में कणीय प्रदूषण की मात्रा बढ़ गई है। मौसम की वर्तमान परिस्थितियों और वर्षा की कमी ने भी इन कणों को वातावरण में लंबे समय तक बने रहने का अवसर दिया है। इसी कारण मानसून के मौसम में भी प्रदूषण का स्तर सामान्य से अधिक दर्ज किया जा रहा है। मौसम विशेषज्ञ लगातार इस स्थिति की निगरानी कर रहे हैं और आगामी दिनों में मौसम में होने वाले बदलावों पर विशेष नजर बनाए हुए हैं।
कुछ दिन पहले तक थी राहत, बारिश और तेज हवाओं ने सुधारी थी स्थिति
दिल्ली-एनसीआर में कुछ दिन पहले तक वायु गुणवत्ता काफी बेहतर हो गई थी। नौ जुलाई को हुई अच्छी मानसूनी वर्षा और तेज हवाओं के कारण राजधानी का दैनिक औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक घटकर केवल 48 रह गया था, जो 'अच्छी' श्रेणी में आता है। वर्षा के कारण वातावरण में मौजूद धूल और प्रदूषक कण नीचे बैठ गए थे, जिससे लोगों को स्वच्छ हवा मिली थी। हालांकि इसके बाद वर्षा की गतिविधियां कमजोर पड़ गईं और बाहरी क्षेत्रों से आने वाली धूल के कारण प्रदूषण का स्तर एक बार फिर तेजी से बढ़ गया। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि मौसम की छोटी-सी परिवर्तनशीलता भी राजधानी की वायु गुणवत्ता पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है।
पंद्रह जुलाई के बाद मानसून की सक्रियता से मिल सकती है राहत
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग का मानना है कि पंद्रह जुलाई के बाद मानसून दोबारा सक्रिय होने की संभावना है। यदि अनुमान के अनुसार अच्छी वर्षा होती है तो वातावरण में मौजूद धूल और प्रदूषक कणों की मात्रा कम होगी तथा वायु गुणवत्ता सूचकांक में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है। फिलहाल प्रदूषण का स्तर बढ़ने के बावजूद आयोग ने GRAP के प्रथम चरण के प्रतिबंध लागू नहीं किए हैं। हालांकि निर्माण स्थलों, सड़कों और अन्य स्थानों पर धूल नियंत्रण के उपायों को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि प्रदूषण की स्थिति और अधिक गंभीर न होने पाए।
दीर्घकालिक समाधान की चुनौती बरकरार, केवल बारिश पर निर्भरता पर्याप्त नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान केवल मौसमी वर्षा से संभव नहीं है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक उत्सर्जन तथा बाहरी क्षेत्रों से आने वाले प्रदूषक कण मिलकर वायु गुणवत्ता को लगातार प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक रणनीति, प्रभावी निगरानी, स्वच्छ परिवहन, हरित क्षेत्र का विस्तार और धूल नियंत्रण के स्थायी उपायों को समान रूप से लागू करना आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन क्षेत्रों में लगातार सुधार किया जाए तो राजधानी क्षेत्र को वर्षभर बेहतर वायु गुणवत्ता उपलब्ध कराई जा सकती है।