नई दिल्ली. देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर संचालित टोल व्यवस्था की समीक्षा के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने 80 से अधिक टोल प्लाजा को चरणबद्ध तरीके से बंद करने का निर्णय लिया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि अनेक टोल प्लाजा ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी मूल पूंजीगत लागत की भरपाई हो जाने के बावजूद वाहन चालकों से टोल वसूली जारी रखी। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई स्थानों पर निर्धारित नियमों का पालन किए बिना वर्षों से टोल संग्रह किया जा रहा था। सरकार का मानना है कि इस निर्णय से राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रा करने वाले करोड़ों वाहन चालकों को सीधी आर्थिक राहत मिलेगी और टोल व्यवस्था में पारदर्शिता भी बढ़ेगी।
लागत पूरी होने के बाद भी जारी रही वसूली, नए निर्माण के नाम पर अपनाया गया तरीका
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार कुछ टोल संचालकों ने टोल वसूली की अवधि बढ़ाने के लिए नई परियोजनाओं का सहारा लिया। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, उत्तराखंड और दक्षिण भारत के कई राज्यों में ऐसे मामले सामने आए, जहां मूल परियोजना की लागत पूरी होने से ठीक पहले अतिरिक्त फ्लाईओवर, अंडरपास अथवा सेवा मार्ग निर्माण के प्रस्ताव भेजे गए। इन नए कार्यों की अनुमानित लागत को मूल परियोजना में जोड़कर यह दर्शाया गया कि कुल निवेश की वसूली अभी शेष है। इस प्रक्रिया के कारण टोल वसूली की अवधि लगातार बढ़ती रही और वाहन चालकों से पूर्ण शुल्क लिया जाता रहा। मंत्रालय की समीक्षा में इस व्यवस्था को नियमों की भावना के विपरीत माना गया है।
साठ किलोमीटर के नियम की अनदेखी, अवैध उप-टोल भी आए जांच के दायरे में
राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल प्लाजा स्थापित करने के लिए न्यूनतम 60 किलोमीटर की दूरी का प्रावधान निर्धारित किया गया है, ताकि यात्रियों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। हालांकि ऑडिट में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां इस नियम की अनदेखी करते हुए उप-टोल स्थापित कर दिए गए। इन स्थानों पर अलग से टोल वसूला जा रहा था, जबकि वे निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरते थे। रिपोर्ट में ऐसे उप-टोल को अवैध माना गया है और उन्हें तत्काल समाप्त करने की सिफारिश की गई है। सरकार अब इन मामलों में नियमानुसार कार्रवाई करते हुए अवैध वसूली पर रोक लगाने की तैयारी में है।
दो चरणों में हटेंगे टोल प्लाजा, तय किया गया स्पष्ट कार्यक्रम
सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का निर्णय लिया है, ताकि यातायात व्यवस्था प्रभावित हुए बिना सुधार किए जा सकें। पहले चरण में अक्टूबर 2026 तक उन 35 टोल प्लाजा को बंद किया जाएगा जिनके अनुबंध की अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी है। इसके बाद दूसरे चरण में शेष ऐसे टोल प्लाजा, जिनके संबंध में ऑडिट रिपोर्ट में अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है, उन्हें 31 दिसंबर 2026 तक हटाने की प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। मंत्रालय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में टोल संचालन पूरी तरह निर्धारित नियमों और पारदर्शी व्यवस्था के अनुरूप हो।
वाहन चालकों को मिलेगी राहत, परिवहन लागत पर भी पड़ सकता है सकारात्मक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित कार्रवाई निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरी होती है तो निजी वाहन चालकों के साथ-साथ व्यावसायिक परिवहन क्षेत्र को भी उल्लेखनीय राहत मिल सकती है। लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लोगों का यात्रा व्यय कम होगा, जबकि माल परिवहन की लागत में भी कमी आने की संभावना है। इसका अप्रत्यक्ष लाभ उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है, क्योंकि परिवहन व्यय घटने से कई वस्तुओं की आपूर्ति लागत प्रभावित होती है। इसके अतिरिक्त टोल प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ने से सड़क अवसंरचना परियोजनाओं में जवाबदेही और जनविश्वास भी मजबूत होने की उम्मीद है।
पारदर्शी टोल व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम, भविष्य में होगी कड़ी निगरानी
सड़क अवसंरचना के विकास के लिए टोल प्रणाली को महत्वपूर्ण वित्तीय साधन माना जाता है, लेकिन इसके संचालन में पारदर्शिता और नियमों का पालन समान रूप से आवश्यक है। सरकार की हालिया कार्रवाई इस दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधारात्मक कदम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में नियमित ऑडिट, डिजिटल निगरानी और अनुबंधों की समयबद्ध समीक्षा सुनिश्चित की जाती है तो अनियमितताओं की संभावना काफी कम हो जाएगी। इससे राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल संग्रह प्रणाली अधिक विश्वसनीय, पारदर्शी और जनहितकारी बन सकेगी।