नई दिल्ली. भारत में महत्वपूर्ण खनिजों के घरेलू प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार करीब ₹2,800 करोड़ की नई योजना पर विचार कर रही है। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रस्ताव को बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष विचार के लिए रखा जा सकता है। योजना का मुख्य उद्देश्य लिथियम और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण की घरेलू क्षमता विकसित करना है, ताकि इनके उच्च शुद्धता वाले यौगिकों का उत्पादन देश में ही किया जा सके। वर्तमान में बैटरी निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा भंडारण जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में इन खनिजों की मांग लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। प्रस्तावित वित्तीय सहायता के माध्यम से निजी क्षेत्र को प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। हालांकि, योजना की अंतिम मंजूरी, वित्तीय प्रावधान और क्रियान्वयन की शर्तें मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होंगी।
लिथियम और निकेल प्रसंस्करण पर रहेगा विशेष जोर
प्रस्तावित योजना में लिथियम और निकेल अयस्कों के साथ उनके मध्यवर्ती उत्पादों को उच्च शुद्धता वाले यौगिकों में बदलने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। लिथियम आधुनिक रिचार्जेबल बैटरियों का प्रमुख घटक है, जबकि निकेल बैटरी की ऊर्जा क्षमता और प्रदर्शन से जुड़े महत्वपूर्ण तत्वों में शामिल है। इन खनिजों का प्रसंस्करण केवल कच्चे माल की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए उन्नत तकनीक, विशेष औद्योगिक संयंत्र और पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होती है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी निर्माण उद्योग के विस्तार के साथ इनकी घरेलू मांग बढ़ने की संभावना है। प्रस्तावित योजना के तहत देश में प्रसंस्करण सुविधाएं विकसित होने से आयातित तैयार खनिज यौगिकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे घरेलू उद्योगों को आपूर्ति की निरंतरता और उत्पादन लागत के प्रबंधन में भी संभावित लाभ मिलेगा।
चार प्रसंस्करण संयंत्रों की स्थापना का प्रस्ताव
योजना के तहत कुल 4 प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करने के लिए पूंजीगत सब्सिडी देने का प्रस्ताव है। इनमें 2 लिथियम प्रसंस्करण संयंत्र होंगे, जिनमें प्रत्येक की न्यूनतम क्षमता 30 किलो टन निर्धारित किए जाने की संभावना है। इसके अतिरिक्त 2 निकेल प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव है, जिनमें प्रत्येक की न्यूनतम क्षमता 50 किलो टन हो सकती है। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए पात्र निवेश का 30 प्रतिशत तक पूंजीगत अनुदान देने की योजना बताई गई है। हालांकि, प्रति लाभार्थी अधिकतम सहायता की सीमा भी निर्धारित की जा सकती है। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक लिथियम प्रसंस्करण इकाई को अधिकतम ₹500 करोड़ और निकेल प्रसंस्करण इकाई को अधिकतम ₹900 करोड़ की सहायता मिल सकती है। इन वित्तीय प्रोत्साहनों का उद्देश्य बड़े औद्योगिक निवेश को आकर्षित करना और देश में महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण का मजबूत आधार तैयार करना है।
निकेल से कोबाल्ट की प्राप्ति को भी मिलेगा प्रोत्साहन
प्रस्तावित योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू निकेल के प्रसंस्करण के दौरान कोबाल्ट की प्राप्ति भी है। कोबाल्ट लिथियम-आयन बैटरियों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाला महत्वपूर्ण खनिज है और इसकी औद्योगिक उपयोगिता इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर ऊर्जा भंडारण प्रणालियों तक फैली हुई है। योजना के तहत निकेल उत्पादन की प्रक्रिया में उपोत्पाद के रूप में मिलने वाले कोबाल्ट को भी उपयोगी औद्योगिक संसाधन के रूप में विकसित करने की संभावना है। इससे एक ही प्रसंस्करण व्यवस्था के माध्यम से दो महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकेगी। वैश्विक स्तर पर इन खनिजों की मांग और आपूर्ति को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह पहल भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। घरेलू स्तर पर कोबाल्ट की प्राप्ति और प्रसंस्करण की क्षमता विकसित होने से बैटरी उद्योग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है।
इलेक्ट्रिक वाहन और ऊर्जा भंडारण उद्योग को मिलेगा लाभ
प्रस्तावित योजना का सीधा संबंध भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ऊर्जा भंडारण क्षेत्र के विस्तार से है। लिथियम, निकेल और कोबाल्ट आधुनिक बैटरी तकनीक के महत्वपूर्ण घटक हैं, जिनका इस्तेमाल स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहनों और बड़े ऊर्जा भंडारण संयंत्रों में किया जाता है। देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की स्वीकार्यता बढ़ने और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के साथ बैटरी भंडारण की जरूरत भी बढ़ रही है। बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली यानी BESS के माध्यम से सौर और पवन ऊर्जा से उत्पादित बिजली को जरूरत के समय इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन और विशेष इस्पात उद्योग को भी महत्वपूर्ण खनिजों की स्थिर आपूर्ति की आवश्यकता होती है। घरेलू प्रसंस्करण क्षमता बढ़ने से इन क्षेत्रों को कच्चे माल और तैयार खनिज यौगिकों की उपलब्धता में सहायता मिल सकती है।
आयात निर्भरता घटाने और रणनीतिक क्षमता बढ़ाने की कोशिश
महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता अब केवल औद्योगिक जरूरत का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा से भी जुड़ गई है। लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे खनिजों की वैश्विक आपूर्ति कुछ चुनिंदा देशों और क्षेत्रों में अधिक केंद्रित है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, निर्यात प्रतिबंध और भू-राजनीतिक तनाव औद्योगिक उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। भारत के लिए केवल खनिजों के आयात की व्यवस्था करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की घरेलू क्षमता विकसित करना भी जरूरी है। प्रस्तावित ₹2,800 करोड़ की योजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण औद्योगिक पहल हो सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविक सफलता घरेलू खनिज संसाधनों की उपलब्धता, उन्नत प्रसंस्करण तकनीक, पर्यावरणीय मानकों और निजी निवेश की भागीदारी पर निर्भर करेगी।
सितंबर से चल रही थी योजना की तैयारी
महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण को प्रोत्साहित करने वाली योजना पर सरकार में पिछले कुछ समय से विचार-विमर्श चल रहा है। सितंबर में खान मंत्रालय के सचिव केशव चंद्र ने संकेत दिया था कि सरकार बैटरी निर्माण से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों को ध्यान में रखते हुए एक नई योजना लाने की तैयारी कर रही है। हालांकि, उस समय उन्होंने प्रस्तावित योजना के वित्तीय प्रावधानों और अन्य विस्तृत पहलुओं का खुलासा नहीं किया था। अब सामने आई जानकारी के अनुसार, करीब ₹2,800 करोड़ के प्रस्ताव में लिथियम और निकेल प्रसंस्करण संयंत्रों की स्थापना के लिए पूंजीगत सहायता देने पर विशेष जोर है। इस संबंध में खान मंत्रालय को भेजे गए सवालों का रिपोर्ट प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला था। फिलहाल यह प्रस्तावित योजना है और इसकी अंतिम मंजूरी तथा विस्तृत शर्तों को लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय का इंतजार है।