ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर खतरे की लकीर खींच दी है। भारतीय ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है, और ऐसे में यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो तेल और गैस की सप्लाई पर सीधा असर पड़ेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध को चार सप्ताह तक चलने की आशंका वाले बयान ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। होर्मुज की खाड़ी—जहां से दुनिया का लगभग 30% तेल ट्रांजिट होता है—संकट का केंद्र बन चुकी है।
भारत के पास कितना तेल और गैस स्टॉक बचा है?
औद्योगिक डेटा के अनुसार भारत का मौजूदा स्टॉक बेहद सीमित है। कच्चे तेल का भंडार लगभग 17–18 दिनों का है, जो आपातकालीन परिस्थितियों में पर्याप्त नहीं माना जाता। पेट्रोल और डीज़ल का स्टॉक अपेक्षाकृत बेहतर है और करीब 20–21 दिनों तक मांग को पूरा कर सकता है। सबसे गंभीर स्थिति एलपीजी की है, जहां सिर्फ 10–12 दिनों का बैकअप बचा है। भारत अपनी लगभग 90% LNG और 85–90% एलपीजी खाड़ी देशों पर निर्भर होकर खरीदता है, इसलिए होर्मुज की खाड़ी में किसी भी तरह की रुकावट घरेलू आपूर्ति को सीधे प्रभावित कर सकती है।
सरकार का इमरजेंसी प्लान सक्रिय
संकट गहराते ही पेट्रोलियम मंत्रालय ने आपूर्ति सुचारु रखने के लिए कई कदम शुरू कर दिए हैं। भारत डीज़ल और पेट्रोल के बड़े निर्यातक के रूप में जाना जाता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर निर्यात पर पाबंदी लगाकर घरेलू बाज़ार को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही, रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने की तैयारी है। समुद्र में मौजूद रूसी टैंकरों को भारत की ओर मोड़ने का विकल्प सक्रिय किया जा चुका है।
एलपीजी की संभावित कमी को देखते हुए सीमित वितरण यानी राशनिंग की संभावना भी जताई गई है। घरेलू रिफाइनरियों को भी एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश जारी किए गए हैं। लक्ष्य यह है कि रसोई गैस की सप्लाई बाधित न हो और आम उपभोक्ता तक इसका असर न्यूनतम रहे।
बाज़ार पर असर और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता
तनाव बढ़ते ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें उछलकर 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। सऊदी अरब और क़तर में तेल और गैस संयंत्रों पर हमलों ने सप्लाई चेन को और कड़ा कर दिया है। ऐसी परिस्थिति में डीज़ल कीमतों के बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि देश के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भरोसा दिलाया है कि भारत में ईंधन की कमी नहीं होने दी जाएगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि हालात लंबे समय तक इस तनावपूर्ण स्थिति में नहीं रहेंगे और ईरान भी इतनी लंबी लड़ाई झेलने की स्थिति में नहीं है। यदि कूटनीतिक बातचीत आगे बढ़ती है तो संकट धीरे-धीरे कम हो सकता है।
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