नई दिल्ली। भारत की आजादी के 79 साल के सफर में देश ने टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई है। कभी विदेशी मशीनों और तकनीक पर निर्भर रहने वाला भारत आज सॉफ्टवेयर, डिजिटल पेमेंट और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। अब देश की नजर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर है।
भारत की इस तकनीकी यात्रा की जड़ें आजादी से पहले के स्वदेशी आंदोलन तक जाती हैं। 1905 में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और देश में सामान के निर्माण पर जोर दिया था। उस समय इसका उद्देश्य आर्थिक आत्मनिर्भरता था। आज यही सोच आधुनिक तकनीक, चिप निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और AI के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में दिखाई दे रही है।
आजादी के बाद रखी गई वैज्ञानिक और तकनीकी नींव
आजादी के बाद भारत ने वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता विकसित करने पर जोर दिया। 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना हुई। इसके बाद 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना शुरू हुई और इसी दौर में IIT खड़गपुर ने भी शैक्षणिक गतिविधियां शुरू कीं।
1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग और 1958 में DRDO की स्थापना हुई। इसके बाद भारत ने अंतरिक्ष और दूरसंचार के क्षेत्र में भी अपनी क्षमताओं को मजबूत करना शुरू किया।
1969 में ISRO की स्थापना हुई और 1975 में भारत का पहला उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ अंतरिक्ष में पहुंचा। वहीं, 1984 में C-DOT ने स्वदेशी टेलीकॉम तकनीक विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया।
सुपरकंप्यूटर से शुरू हुई आत्मनिर्भरता की नई कहानी
कंप्यूटर और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के क्षेत्र में भी भारत ने चुनौतियों के बीच अपनी क्षमता विकसित की। अमेरिका से सुपरकंप्यूटर तकनीक हासिल करने में दिक्कतों के बाद 1988 में C-DAC की स्थापना की गई। इसी संस्था ने आगे चलकर PARAM सुपरकंप्यूटर की सीरीज विकसित की। यह दौर भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ।
1991 के बाद IT सेक्टर ने बदली तस्वीर
1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत के टेक्नोलॉजी सेक्टर ने तेजी से विस्तार किया। टेलीकॉम में निजी कंपनियों की एंट्री हुई और इंटरनेट का प्रसार बढ़ने लगा।
TCS, Infosys, Wipro और HCL जैसी भारतीय IT कंपनियों ने वैश्विक स्तर पर अपनी जगह बनाई। बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहर बड़े टेक्नोलॉजी हब बनकर उभरे।
Y2K और BPO के दौर ने भारत को दुनिया के प्रमुख IT और बैक-ऑफिस केंद्रों में शामिल कर दिया। आज भारतीय टेक्नोलॉजी सेक्टर का आकार करीब 315 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है और इसमें लाखों लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।
UPI ने दुनिया को दिखाई भारत की डिजिटल ताकत
स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने भारत की डिजिटल क्रांति को नई रफ्तार दी। आधार ने डिजिटल पहचान का आधार तैयार किया, जनधन खातों ने बैंकिंग सेवाओं को व्यापक बनाया और मोबाइल इंटरनेट ने डिजिटल सेवाओं की पहुंच गांव-गांव तक बढ़ाई।
इसके बाद UPI ने डिजिटल पेमेंट की तस्वीर ही बदल दी। जुलाई 2026 में UPI पर 23.66 अरब ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल वैल्यू करीब 29.88 लाख करोड़ रुपये रही। जून 2026 तक UPI यूजर्स की संख्या 55.49 करोड़ से अधिक हो चुकी थी। UPI की खासियत यह रही कि इसने बैंक, फिनटेक कंपनियों, दुकानदारों और ग्राहकों को एक साझा डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़ दिया।
सॉफ्टवेयर से इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग तक
भारत की टेक्नोलॉजी कहानी अब केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है। सरकार इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए PLI जैसी योजनाओं पर जोर दे रही है। मार्च 2026 तक PLI योजनाओं के तहत 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश आने और 14.15 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने का दावा किया गया। इसी अवधि में 15.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात भी हुआ। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में भी निवेश बढ़ा है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारत अब सिर्फ दुनिया के लिए सॉफ्टवेयर बनाने के बजाय हार्डवेयर और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है।
सेमीकंडक्टर और AI पर बड़ा दांव
अब भारत की अगली बड़ी प्राथमिकता सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। सेमीकंडक्टर आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। स्मार्टफोन, कार, टेलीकॉम उपकरण, डिफेंस सिस्टम, डेटा सेंटर और AI सिस्टम तक में चिप का इस्तेमाल होता है।
जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने Semicon 2.0 को मंजूरी दी, जिसके लिए 1.27 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही भारत AI मिशन के तहत AI कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रहा है। AI मिशन के लिए 10,371.92 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। 2026 की शुरुआत तक AI कंप्यूटिंग के लिए 38,000 से ज्यादा GPUs जोड़े जाने की जानकारी सामने आई थी।
GCC भी बन रहे हैं रिसर्च और इनोवेशन के केंद्र
भारत के Global Capability Centres (GCC) भी अब सिर्फ बैक-ऑफिस तक सीमित नहीं हैं। देश में मौजूद GCC में AI, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में रिसर्च और इंजीनियरिंग का काम बढ़ रहा है। 2024 में भारत में 1,700 से ज्यादा GCC थे, जिनमें करीब 19 लाख प्रोफेशनल काम कर रहे थे। यह भारत की वैश्विक टेक्नोलॉजी वैल्यू चेन में बढ़ती भूमिका को दिखाता है।
सबसे बड़ी चुनौती R&D
भारत की तकनीकी प्रगति के बावजूद कई चुनौतियां अभी बाकी हैं। इनमें सबसे बड़ी चुनौती रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में निवेश बढ़ाना है। 2020-21 में भारत का R&D खर्च GDP का करीब 0.64 प्रतिशत था। ऐसे में आने वाले दौर में सिर्फ इंजीनियरिंग टैलेंट तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को विश्वविद्यालयों, रिसर्च संस्थानों, निजी निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, AI कंप्यूटिंग और प्रतिभाओं को एक साथ जोड़ना होगा।
स्वदेशी का बदल गया अर्थ
1905 में स्वदेशी का मतलब था विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और देश में वस्तुओं का निर्माण। आज स्वदेशी का अर्थ कहीं ज्यादा व्यापक हो चुका है।
अब भारत केवल विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करने वाला देश नहीं बनना चाहता, बल्कि टेक्नोलॉजी विकसित करने, उसका स्वामित्व हासिल करने और उसे दुनिया को निर्यात करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
चरखे से शुरू हुआ आत्मनिर्भरता का विचार आज सैटेलाइट, सॉफ्टवेयर, UPI, AI और सेमीकंडक्टर तक पहुंच चुका है। आने वाले वर्षों में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह दुनिया का केवल बड़ा टेक्नोलॉजी बाजार न बने, बल्कि दुनिया के लिए टेक्नोलॉजी बनाने और निर्यात करने वाला प्रमुख केंद्र भी बने।