भोपाल। मध्य प्रदेश में वैवाहिक विवाद और पुरुषों के खिलाफ हिंसा से जुड़े आंकड़ों ने सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। पुरुष अधिकार संगठनों के मुताबिक, जनवरी से जून 2026 के बीच प्रदेश में पतियों की हत्या के 36 मामले सामने आए हैं। इस आंकड़े के साथ मध्य प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर बताया जा रहा है।93 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश इस सूची में पहले स्थान पर है।
इंदौर का सोनम रघुवंशी कांड रहा चर्चित
मध्य प्रदेश में इस अवधि के दौरान सामने आए मामलों में इंदौर का चर्चित **सोनम रघुवंशी हत्याकांड** सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। इस मामले ने वैवाहिक रिश्तों में बढ़ते तनाव और हिंसा को लेकर कई सवाल खड़े किए। पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बदलती जीवनशैली, पारिवारिक दबाव, आपसी विवाद और वैवाहिक तनाव के चलते इस तरह की घटनाओं को लेकर चिंता बढ़ी है।
छह महीने में हेल्पलाइन कॉल 12 हजार के पार
वैवाहिक कलह और मानसिक तनाव से जूझ रहे पुरुषों की ओर से मदद मांगने के मामलों में भी इजाफा होने का दावा किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में मध्य प्रदेश से पुरुष अधिकार हेल्पलाइन पर 8,108 कॉल दर्ज की गई थीं। वहीं जनवरी से जून 2026 के सिर्फ छह महीनों में यह संख्या बढ़कर 12,577 पहुंच गई। यानी पूरे 2025 की तुलना में 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही हेल्पलाइन कॉल की संख्या करीब 55 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है।
राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर तेज
पति हत्या के मामलों और हेल्पलाइन पर बढ़ती शिकायतों के बीच अब राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनाने की मांग ने भी जोर पकड़ा है। पुरुष अधिकार संगठनों का तर्क है कि महिलाओं की सुरक्षा और शिकायतों के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग की तरह पुरुषों की समस्याओं, शिकायतों और अधिकारों के लिए भी एक समर्पित संस्थागत मंच होना चाहिए। इस मांग को लेकर देशभर में करीब 70 गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और 10 से 12 हजार कार्यकर्ताओं के सक्रिय होने का दावा किया जा रहा है। संगठन जागरूकता अभियान चलाकर पुरुषों से जुड़े वैवाहिक विवाद, मानसिक तनाव और कानूनी शिकायतों को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं।
बदलते रिश्तों ने बढ़ाई चिंता
पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि वैवाहिक विवादों को केवल निजी या पारिवारिक मामला मानने के बजाय घरेलू तनाव और हिंसा के व्यापक सामाजिक पहलू के रूप में भी देखा जाना चाहिए। हालांकि, इन आंकड़ों के स्रोत और पति हत्या के मामलों की आधिकारिक श्रेणी को लेकर स्वतंत्र सरकारी पुष्टि अलग से जरूरी है। ऐसे में आंकड़ों को पुरुष अधिकार संगठनों के दावे के रूप में देखना उचित होगा।