कोलकता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का उदय किसी सामान्य राजनीतिक यात्रा की तरह नहीं रहा। कोलकाता के एक साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने छात्र राजनीति के जरिए अपनी पहचान बनाई। कम उम्र में ही उनके भीतर सत्ता के खिलाफ लड़ने का आक्रामक तेवर दिखाई देने लगा था। आपातकाल के दौर में जयप्रकाश नारायण की गाड़ी पर चढ़कर विरोध दर्ज कराने वाली घटना ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और यहीं से उनकी ‘स्ट्रीट फाइटर’ वाली छवि मजबूत होती चली गई।
सोमनाथ चटर्जी को हराकर बनीं ‘जायंट किलर’
साल 1984 का लोकसभा चुनाव ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। कांग्रेस ने उन्हें दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ मैदान में उतारा था। बेहद युवा उम्र में उन्होंने अनुभवी नेता को हराकर पूरे देश को चौंका दिया। इस जीत ने ममता को सिर्फ पहचान ही नहीं दिलाई, बल्कि उन्हें बंगाल की आक्रामक और जुझारू महिला नेता के रूप में स्थापित कर दिया।
वाम मोर्चे के खिलाफ आंदोलन से मिली बड़ी ताकत
पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक वाम मोर्चे का दबदबा रहा, लेकिन ममता बनर्जी ने लगातार सड़क से लेकर विधानसभा तक संघर्ष जारी रखा। किसानों, महिलाओं और गरीब तबकों के मुद्दों को उठाकर उन्होंने जनता के बीच मजबूत पकड़ बनाई। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन ने उन्हें बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बना दिया। यही आंदोलन आगे चलकर वामपंथी सत्ता के पतन और तृणमूल कांग्रेस के उदय की वजह बना।
सत्ता में आने के बाद बढ़े विवाद और चुनौतिया
मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी की राजनीति का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता गया। विपक्ष लगातार उन पर तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक केंद्रीकरण के आरोप लगाता रहा। शिक्षक भर्ती घोटाले, भ्रष्टाचार के आरोप और पार्टी नेताओं पर लगे गंभीर आरोपों ने उनकी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। कई मामलों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी ने जनता के बीच सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।
आंतरिक असंतोष और संगठनात्मक कमजोरी बनी परेशानी
तृणमूल कांग्रेस लंबे समय तक ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता पर निर्भर रही, लेकिन समय के साथ पार्टी के भीतर असंतोष भी बढ़ने लगा। कई पुराने नेताओं की नाराजगी और संगठन में बढ़ती गुटबाजी ने पार्टी की जड़ों को कमजोर किया। विपक्ष ने इसी कमजोरी को मुद्दा बनाकर जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की कि तृणमूल अब बदलाव की ऊर्जा खो चुकी है।
बदलते जनमत ने बढ़ाई ‘दीदी’ की मुश्किलें
साल 2026 के राजनीतिक माहौल में बंगाल में बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। युवाओं के बीच बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दों ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कभी जनता के गुस्से की सबसे बड़ी आवाज रहीं ममता बनर्जी अब खुद जनता के सवालों के घेरे में दिखाई दे रही हैं। यही कारण है कि उनकी राजनीतिक यात्रा का यह दौर सबसे चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।