राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर देश के साथ-साथ विदेशों में भी विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है। इसी क्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत अगस्त के अंतिम सप्ताह में अमेरिका और उसके बाद कनाडा की यात्रा पर जाएंगे। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में आयोजित ‘वननेस सेलिब्रेशन’ में वे मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करेंगे। इस यात्रा का उद्देश्य प्रवासी भारतीय समाज, युवाओं, शिक्षाविदों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के साथ संवाद स्थापित करना और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर विचार साझा करना बताया जा रहा है।
नई पीढ़ी तक पहुंच बढ़ाने पर संघ का विशेष जोर
संघ अपने शताब्दी वर्ष के दौरान नई पीढ़ी, विशेष रूप से Gen-Z के साथ संपर्क बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश को ध्यान में रखते हुए संगठन युवाओं तक अपनी विचारधारा, सामाजिक गतिविधियों और राष्ट्र निर्माण से जुड़े दृष्टिकोण को नए माध्यमों से पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के युवा, विद्यार्थी और विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर भी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जा रहे हैं। इसी उद्देश्य से अमेरिका में कई संवाद कार्यक्रम प्रस्तावित हैं, जिनमें भारतीय मूल के बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी रहने की संभावना है।
विश्वबंधुत्व और सामाजिक समरसता रहेगा प्रमुख विषय
अमेरिका में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान डॉ. मोहन भागवत विश्वबंधुत्व, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकता और मानवीय मूल्यों जैसे विषयों पर अपने विचार रखेंगे। ‘वननेस’ अर्थात एकात्मता की अवधारणा को भारतीय दार्शनिक परंपरा के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और सहयोग की आवश्यकता पर भी चर्चा होने की संभावना है। कार्यक्रमों का उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक मूल्यों और वैश्विक समाज में भारतीय समुदाय की भूमिका पर विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना बताया जा रहा है। अमेरिका के बाद उनका कनाडा दौरा प्रस्तावित है, जिसे सरसंघचालक के रूप में उनकी पहली कनाडा यात्रा माना जा रहा है।
ब्रिटेन दौरे की भी चर्चा, राजनीतिक हलकों में बढ़ी दिलचस्पी
सूत्रों के अनुसार अमेरिका और कनाडा के बाद डॉ. मोहन भागवत के ब्रिटेन जाने की भी संभावना व्यक्त की जा रही है। इसी बीच उनके प्रस्तावित विदेश दौरे को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। हाल के दिनों में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) से संबंधित संभावित बदलावों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संरचना तथा वित्तीय व्यवस्था को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा प्रश्न उठाए गए हैं। कर्नाटक सरकार के एक मंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से संगठन के पंजीकरण और वित्तीय स्रोतों से जुड़े प्रश्न उठाए जाने के बाद यह विषय राजनीतिक बहस का हिस्सा बना हुआ है। हालांकि इन मुद्दों पर संबंधित पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें और दृष्टिकोण हैं।
क्या है FCRA और क्यों रहता है चर्चा में
FCRA अर्थात विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम भारत का वह कानून है, जिसके माध्यम से विदेशों से प्राप्त होने वाले आर्थिक सहयोग, दान और अन्य प्रकार के विदेशी अंशदान का नियमन किया जाता है। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी स्रोतों से प्राप्त धनराशि का उपयोग केवल स्वीकृत उद्देश्यों के लिए हो तथा उसका प्रयोग राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था अथवा देशहित के प्रतिकूल गतिविधियों में न किया जाए। इस अधिनियम के अंतर्गत विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाली पात्र संस्थाओं को गृह मंत्रालय से निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पंजीकरण या अनुमति प्राप्त करनी होती है। समय-समय पर इस कानून में संशोधन और उसके प्रभाव को लेकर सार्वजनिक तथा राजनीतिक विमर्श भी होता रहा है।
प्रवासी भारतीयों के साथ संवाद को नई दिशा देने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय मूल के समुदायों की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति के बीच ऐसे दौरे सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक संपर्क को नया आयाम प्रदान करते हैं। अमेरिका और कनाडा में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग शिक्षा, विज्ञान, उद्योग और प्रौद्योगिकी सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में शताब्दी वर्ष के दौरान आयोजित कार्यक्रमों को केवल संगठनात्मक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान और प्रवासी समाज के साथ संवाद के व्यापक प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में इस यात्रा के कार्यक्रमों और उनके प्रभाव पर देश और विदेश दोनों में राजनीतिक तथा सामाजिक स्तर पर नजर बनी रहेगी।