नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में बुधवार को ग्लेशियर ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की बदलती प्रकृति को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। शुरुआती तौर पर भूकंपीय घटना से जोड़कर देखी गई इस आपदा के बाद उपग्रह तस्वीरों और विशेषज्ञों के विश्लेषण में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटकर नीचे गिरने तथा उसके बाद बर्फ, चट्टान और मलबे के तेज बहाव की भूमिका सामने आई है। इस घटना के बाद सीमा क्षेत्र में एक नई झील के बनने और उसके संभावित रूप से फटने की आशंका ने खतरे को और जटिल बना दिया है।
नेपाल में हुई इस त्रासदी का महत्व केवल वहां तक सीमित नहीं है, क्योंकि हिमालय एक साझा भौगोलिक और जलवैज्ञानिक प्रणाली है। पर्वतीय क्षेत्रों में बनने वाली झीलों, हिमनदों और नदियों से जुड़े बदलावों का प्रभाव नीचे बसे मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। भारत के लिए यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी राज्यों में अनेक ग्लेशियल झीलें तेजी से बदलते तापमान, हिमनदों के पीछे हटने और अस्थिर चट्टानी एवं मोरेन संरचनाओं के कारण जोखिम के दायरे में आती हैं। हालिया आपदा ने इस सवाल को फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है कि केवल झीलों की पहचान और मानचित्रण पर्याप्त है या उनके आसपास प्रभावी पूर्व चेतावनी तथा तत्काल प्रतिक्रिया तंत्र भी विकसित किए जा चुके हैं।
भारत में करीब 200 झीलें उच्च जोखिम वाले दायरे में
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में करीब 200 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किए जाने की जानकारी सामने आई है। इन झीलों की संवेदनशीलता का आकलन केवल उनके आकार से नहीं, बल्कि उनकी स्थिति, प्राकृतिक बांध की मजबूती, आसपास के ग्लेशियरों की गतिविधि, जलस्तर में बदलाव और नीचे की ओर मौजूद आबादी तथा बुनियादी ढांचे के आधार पर किया जाता है। किसी ग्लेशियल झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूटने पर कुछ ही समय में अत्यधिक मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर तेजी से पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में नदी घाटियों में बसे गांवों, सड़कों, पुलों, पनबिजली परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण ढांचे को बेहद कम समय में गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
सिक्किम में इस जोखिम को लेकर हाल के दिनों में वैज्ञानिक गतिविधियां भी तेज हुई हैं। राज्य के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने जुलाई-अगस्त 2026 में मंगन जिले की उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों का बहु-विषयक वैज्ञानिक आकलन किया। इस अभियान में झीलों से संबंधित जलमापी, भूवैज्ञानिक, भूभौतिकीय, जलवैज्ञानिक, भू-आकृतिक और मौसम संबंधी आंकड़े जुटाए गए, ताकि भविष्य के खतरे का वैज्ञानिक आकलन और निगरानी व्यवस्था बेहतर की जा सके। यह पहल बताती है कि हिमालयी झीलों को लेकर जोखिम प्रबंधन अब केवल आपदा के बाद की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि लगातार वैज्ञानिक निगरानी की आवश्यकता है।
गंगा बेसिन में हजारों ग्लेशियल झीलें
भारत के लिए चिंता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हिमालयी ग्लेशियल झीलों का बड़ा हिस्सा उन नदी प्रणालियों से जुड़ा है, जो आगे चलकर घनी आबादी वाले मैदानी क्षेत्रों में पहुंचती हैं। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के ग्लेशियल झील मानचित्रण के अनुसार गंगा नदी बेसिन में 0.25 हेक्टेयर से बड़ी 4,707 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी। इनका अध्ययन क्षेत्र करीब 2,47,110 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह आंकड़ा अपने आप में खतरे की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह जरूर बताता है कि हिमालयी क्षेत्र में मौजूद जल निकायों की निगरानी कितने बड़े भौगोलिक क्षेत्र में करनी पड़ती है।
विशेषज्ञों के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इनमें से कौन-सी झीलें वास्तव में अचानक बाढ़ पैदा करने की क्षमता रखती हैं और उनके नीचे किस स्तर की आबादी तथा महत्वपूर्ण ढांचा मौजूद है। हर ग्लेशियल झील समान रूप से खतरनाक नहीं होती, लेकिन तेजी से बढ़ती झील, कमजोर मोरेन बांध और उसके ऊपर या आसपास अस्थिर बर्फ एवं चट्टानी ढलान का संयोजन खतरे को कई गुना बढ़ा सकता है। यही कारण है कि जोखिम वाले क्षेत्रों में केवल झील का आकार दर्ज करना पर्याप्त नहीं माना जाता। झील के जलस्तर, बांध की संरचना, आसपास के भू-भाग और संभावित बाढ़ मार्ग की लगातार निगरानी करना आपदा जोखिम कम करने की दिशा में ज्यादा महत्वपूर्ण कदम है।
दक्षिण ल्होनक झील ने 2023 में दिखाया था तबाही का पैमाना
भारत पहले ही ग्लेशियल झील फटने से पैदा होने वाली आपदा का भयावह अनुभव कर चुका है। 3 अक्टूबर 2023 की रात सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील के पास करीब 14.7 मिलियन घन मीटर जमी हुई मोरेन सामग्री का बड़ा हिस्सा झील में जा गिरा। इससे करीब 20 मीटर ऊंची सुनामी जैसी लहर पैदा हुई और प्राकृतिक बांध के टूटने के बाद करीब 50 मिलियन घन मीटर पानी नीचे की ओर बह निकला। इसके बाद तीस्ता नदी घाटी में आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर मलबा और तलछट बहाई तथा महत्वपूर्ण पनबिजली ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया।
इस घटना के वैज्ञानिक अध्ययन ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी आपदाएं एक अकेली प्राकृतिक घटना का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि कई प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़कर विनाशकारी श्रृंखला बना सकती हैं। दक्षिण ल्होनक झील की घटना में ढलान का टूटना, बर्फ और चट्टान का झील में गिरना, विशाल लहर का उठना, प्राकृतिक बांध का टूटना और उसके बाद पानी तथा मलबे का तीव्र बहाव एक ही आपदा श्रृंखला का हिस्सा बन गए। अध्ययन के अनुसार इस बाढ़ ने लगभग 270 मिलियन घन मीटर तलछट को गतिशील किया और तीस्ता घाटी में व्यापक नुकसान पहुंचाया। यह उदाहरण बताता है कि हिमालय में छोटी दिखाई देने वाली प्रारंभिक घटना भी नीचे की ओर पहुंचते-पहुंचते बहु-स्तरीय आपदा का रूप ले सकती है।
ग्लेशियल झील फटने की प्रक्रिया क्यों है इतनी खतरनाक
ग्लेशियल झील से अचानक बाढ़ आने की प्रक्रिया को सामान्य बाढ़ से अलग समझना जरूरी है। किसी झील के सामने बर्फ, चट्टान और मोरेन से बना प्राकृतिक बांध मौजूद होता है। यदि किसी ढलान से भारी मात्रा में चट्टान या बर्फ झील में गिरती है, तो पानी में अचानक बड़ी लहर पैदा हो सकती है। यह लहर प्राकृतिक बांध को कमजोर या पूरी तरह नष्ट कर सकती है। इसके बाद झील का पानी बहुत तेज गति से नीचे की ओर बहता है और रास्ते में मिट्टी, पत्थर, पेड़ तथा अन्य मलबे को अपने साथ जोड़ता चला जाता है। यही कारण है कि ग्लेशियल झील से निकलने वाली बाढ़ कुछ ही दूरी में अत्यधिक शक्तिशाली मलबा-बाढ़ में बदल सकती है।
नेपाल की हालिया घटना ने इसी जटिल श्रृंखलाबद्ध खतरे को सामने ला दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियर के टूटने से निकला मलबा नदी के प्रवाह को रोककर अस्थायी झील बना सकता है और बाद में उस झील के टूटने से दूसरी बाढ़ पैदा हो सकती है। मौजूदा घटनाक्रम में सीमा क्षेत्र में बनी नई झील को लेकर भी इसी तरह की आशंका व्यक्त की गई है, हालांकि वर्तमान स्थिति में उसके फटने का जोखिम घटने के संकेत भी मिले हैं। इसके बावजूद क्षेत्र में एक अन्य बड़े जल निकाय की मौजूदगी के कारण निगरानी जारी रखना जरूरी माना जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई हिमालयी अस्थिरता
हिमालयी ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ने का प्रभाव केवल बर्फ पिघलने तक सीमित नहीं है। तापमान में बदलाव से लंबे समय से जमी हुई भूमि और चट्टानी संरचनाओं की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है। दक्षिण ल्होनक झील की आपदा पर हुए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में हिमनदों के दीर्घकालिक क्षरण, पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने और जलवायु गर्म होने को आपदा जोखिम बढ़ाने वाले कारकों से जोड़ा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्म होती पर्वतीय परिस्थितियां बर्फ, चट्टान और मोरेन से बनी संरचनाओं की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे अचानक ढलान धंसने या झील में बड़े पैमाने पर मलबा गिरने की संभावना बढ़ती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हिमालय में हर ग्लेशियल झील तत्काल विस्फोट के खतरे में है। वास्तविक जोखिम का आकलन स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर करना होगा। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनदों में तेजी से बदलाव और पर्वतीय भू-भाग की अस्थिरता आपदा प्रबंधन के लिए नई चुनौतियां जरूर पैदा कर रही है। इसलिए जोखिम वाले क्षेत्रों में पुराने आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय लगातार नए उपग्रह चित्र, स्थल निरीक्षण, जलस्तर संबंधी आंकड़े और भू-आकृतिक बदलावों की निगरानी करना आवश्यक हो गया है।
भारत के लिए अब केवल निगरानी नहीं, पूर्व चेतावनी जरूरी
नेपाल की घटना ने भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह रखा है कि यदि हिमालयी क्षेत्र में किसी ग्लेशियल झील में अचानक बदलाव होता है, तो उसकी सूचना नीचे बसे लोगों तक कितनी जल्दी पहुंच सकती है। उच्च जोखिम वाली झीलों की पहचान पहला कदम है, लेकिन इसके बाद वास्तविक समय की निगरानी, स्वचालित सेंसर, उपग्रह आधारित निगरानी, नदी जलस्तर मापन और स्थानीय स्तर पर चेतावनी तंत्र को एक साथ जोड़ना जरूरी होगा। जिन नदी घाटियों में पनबिजली परियोजनाएं, सड़कें, पुल और घनी आबादी मौजूद हैं, वहां संभावित बाढ़ मार्गों का वैज्ञानिक मानचित्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
आपदा विशेषज्ञों के लिए चुनौती केवल प्राकृतिक खतरे की पहचान करना नहीं, बल्कि खतरे और जोखिम के बीच अंतर समझना भी है। किसी दूरस्थ झील का फटना गंभीर प्राकृतिक घटना हो सकता है, लेकिन यदि उसके नीचे आबादी या महत्वपूर्ण ढांचा नहीं है तो उसका सामाजिक प्रभाव सीमित रह सकता है। इसके विपरीत छोटी झील से निकलने वाला तेज बहाव यदि किसी संवेदनशील घाटी में पहुंच जाए तो नुकसान कहीं अधिक हो सकता है। इसलिए भारत को उच्च जोखिम वाली झीलों की सूची के साथ-साथ संभावित बाढ़ मार्ग, प्रभावित आबादी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की समेकित जोखिम योजना तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा।
हिमालय की चेतावनी को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
नेपाल की हालिया तबाही और सिक्किम की 2023 की त्रासदी एक समान संदेश देती हैं कि हिमालय में आपदा की तैयारी केवल मानसूनी बाढ़ या भूस्खलन तक सीमित नहीं रखी जा सकती। ग्लेशियर, झील, चट्टान, नदी और बदलता तापमान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनमें से किसी एक में अचानक बदलाव पूरी घाटी की परिस्थितियां बदल सकता है। भारत में करीब 200 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान इस चुनौती के पैमाने को समझने का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन असली सफलता तभी मानी जाएगी जब वैज्ञानिक निगरानी से मिलने वाली चेतावनी समय रहते स्थानीय प्रशासन और आम लोगों तक पहुंच सके।
हिमालय भारत के लिए केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि जल, ऊर्जा, पर्यावरण और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ी जीवनरेखा है। इसलिए ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम को सीमावर्ती या दूरदराज के पर्वतीय क्षेत्रों की समस्या मानना बड़ी भूल होगी। भविष्य की रणनीति में जोखिम वाले क्षेत्रों की नियमित वैज्ञानिक जांच, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित बुनियादी ढांचे, स्थानीय समुदायों का प्रशिक्षण और पड़ोसी देशों के साथ समयबद्ध सूचना साझा करने की व्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी। नेपाल की आपदा ने एक बार फिर संकेत दिया है कि हिमालय में चेतावनी आने का इंतजार करने के बजाय खतरे की निगरानी पहले से शुरू करनी होगी।