सावन के दौरान मांग अपेक्षाकृत कम रहने और बाजार में पर्याप्त आपूर्ति के कारण कुछ समय तक प्याज के थोक भाव पर नियंत्रण बना हुआ था, लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। देश के कई हिस्सों में मंडियों में प्याज की आवक घटने के साथ कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो गई है। इसका सबसे ज्यादा असर खुदरा बाजार में दिखाई दे रहा है, जहां थोक और फुटकर कीमतों के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर में जहां खुदरा बाजार में प्याज करीब 50 से 55 रुपये किलो बिक रहा है, वहीं खुले बाजार में कई जगह भाव 60 से 70 रुपये किलो तक पहुंच गया है। कुछ राज्यों में अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की कीमत 80 रुपये किलो तक पहुंचने से आम उपभोक्ताओं के रसोई बजट पर सीधा असर पड़ने लगा है।
नासिक में पुराने स्टॉक की कमी से बढ़ी चिंता
प्याज की कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र में पुराने भंडारित प्याज की उपलब्धता कम होना एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। देश के प्याज कारोबार में नासिक और आसपास के क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए वहां आपूर्ति और भंडारण की स्थिति में होने वाला बदलाव दूसरे राज्यों के बाजारों को भी प्रभावित करता है। पुराने स्टॉक की मात्रा कम होने के साथ नई फसल की पर्याप्त आवक का इंतजार बाजार की चिंता बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, भंडारण के दौरान गुणवत्ता प्रभावित होने से बाजार में उपलब्ध अच्छे प्याज की मात्रा भी सीमित हुई है। ऐसी स्थिति में मांग और आपूर्ति के बीच मामूली अंतर भी खुदरा कीमतों में तेज उछाल का कारण बन सकता है।
कानपुर मंडी में आवक घटी, 3 दिन में करीब 10 रुपये बढ़ा भाव
कानपुर की चकरपुर मंडी में प्याज की रोजाना आवक करीब 6.50 लाख किलो से घटकर लगभग 5 लाख किलो रह गई है। आवक में आई इस कमी का सीधा असर थोक कीमतों पर पड़ा है और प्याज का भाव बढ़कर 42 से 45 रुपये किलो तक पहुंच गया है। इससे पहले बुधवार को मंडी में प्याज करीब 35 से 40 रुपये किलो बिक रहा था। यानी कुछ ही दिनों में कीमत में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। चकरपुर मंडी सब्जी व्यापार मंडल के अध्यक्ष सौरभ पांडेय के अनुसार बीते 3 दिनों में प्याज के भाव में करीब 10 रुपये तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। कारोबारियों का कहना है कि यदि मंडी में आवक इसी तरह कम रही तो आने वाले दिनों में थोक भाव में और बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
बंगाल से जम्मू तक उपभोक्ताओं की बढ़ी परेशानी
प्याज की कीमतों में तेजी केवल एक या दो राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में इसके प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल में करीब 2 सप्ताह पहले जिस प्याज का भाव 30 से 35 रुपये किलो के आसपास था, वह अब कई बाजारों में 70 से 80 रुपये किलो तक पहुंच गया है। राजस्थान में भी लगातार बढ़ोतरी के बाद प्याज करीब 50 रुपये किलो तक पहुंच गया है। जम्मू में प्याज का भाव लगभग 60 रुपये किलो बताया जा रहा है और पिछले 15 दिनों में कीमत में करीब 20 से 25 रुपये की वृद्धि हो चुकी है। उत्तराखंड के देहरादून में प्याज 60 रुपये किलो, हरिद्वार की ज्वालापुर मंडी में करीब 50 रुपये किलो और हल्द्वानी मंडी में 46 से 50 रुपये किलो के आसपास बिक रहा है।
बिहार में भी बढ़े प्याज के दाम
बिहार में भी प्याज की बढ़ती कीमतों का असर बाजार में साफ दिखाई देने लगा है। पटना के मीठापुर और बाजार समिति क्षेत्र में शुक्रवार को प्याज का भाव करीब 55 रुपये किलो तक पहुंच गया। दूसरी ओर, ऊधम सिंह नगर की रुद्रपुर मंडी में अपेक्षाकृत कम भाव 35 से 40 रुपये किलो के बीच बना हुआ है। अलग-अलग मंडियों में कीमतों के इस अंतर से साफ है कि परिवहन, स्थानीय आवक, गुणवत्ता और मांग के आधार पर प्याज का बाजार भाव काफी तेजी से बदल रहा है। जहां स्थानीय आपूर्ति कमजोर है, वहां खुदरा विक्रेताओं तक पहुंचने से पहले ही प्याज की कीमत बढ़ जाती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनकी दैनिक रसोई में प्याज नियमित रूप से इस्तेमाल होता है।
सरकारी उपायों के बावजूद क्यों नहीं थम रही तेजी
प्याज की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार बफर स्टॉक का इस्तेमाल कर रही है और प्रमुख खपत वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। इसके बावजूद बाजार में तेजी का दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसका एक कारण यह है कि सरकारी स्टॉक की आपूर्ति हर बाजार तक समान गति से नहीं पहुंचती और स्थानीय स्तर पर उपलब्धता की कमी बनी रहने पर खुदरा कीमतें ऊंची रह सकती हैं। इसके अलावा थोक और खुदरा बाजार के बीच कीमतों का अंतर भी उपभोक्ताओं के लिए चिंता का कारण है। यदि मंडियों में नियमित और पर्याप्त मात्रा में प्याज पहुंचता रहे तथा परिवहन और वितरण व्यवस्था सुचारु बनी रहे तो कीमतों पर दबाव कम किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल कई क्षेत्रों में आपूर्ति की असमानता बाजार को प्रभावित कर रही है।
मुनाफाखोरी पर निगरानी की जरूरत
प्याज की कीमत बढ़ने के साथ ही बाजार में मुनाफाखोरी और कृत्रिम कमी पैदा करने की आशंका भी बढ़ जाती है। जब थोक मंडियों में भाव बढ़ता है तो उसका असर खुदरा बाजार में स्वाभाविक रूप से पड़ सकता है, लेकिन यदि थोक और खुदरा कीमतों के बीच असामान्य अंतर दिखाई देता है तो स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। कारोबारियों द्वारा अधिक कीमत वसूलने, अनावश्यक भंडारण करने या उपलब्ध माल को रोककर बाजार में कमी का माहौल बनाने जैसी गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए केवल अतिरिक्त प्याज बाजार में उतारना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसकी उपलब्धता अंतिम खुदरा बाजार तक सुनिश्चित करनी होगी। इसी स्तर पर सरकारी हस्तक्षेप की वास्तविक प्रभावशीलता दिखाई देगी।
नई फसल की आवक पर टिकी बाजार की नजर
अब प्याज बाजार की अगली दिशा काफी हद तक नई फसल की आवक पर निर्भर करेगी। यदि आने वाले दिनों में मंडियों में पर्याप्त मात्रा में प्याज पहुंचता है तो मौजूदा तेजी पर रोक लग सकती है और खुदरा कीमतों में धीरे-धीरे नरमी आने की संभावना बनेगी। इसके विपरीत यदि आवक कमजोर रहती है और पुराने भंडार की कमी बढ़ती जाती है तो कीमतों पर दबाव कुछ समय और बना रह सकता है। प्याज जैसी रोजमर्रा की आवश्यक वस्तु में कीमतों का अचानक बढ़ना केवल उपभोक्ता बजट को प्रभावित नहीं करता, बल्कि खाद्य महंगाई की व्यापक तस्वीर पर भी असर डाल सकता है। इसलिए बाजार में स्थिर आपूर्ति बनाए रखना और कीमतों की नियमित निगरानी करना फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
रसोई के बजट पर सीधा असर
प्याज के दाम में 20 से 30 रुपये किलो तक की बढ़ोतरी आम परिवार के मासिक खर्च में भले ही छोटी दिखाई दे, लेकिन नियमित घरेलू खपत को देखते हुए इसका संचयी प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है। निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए सब्जियों और अन्य आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में एक साथ बढ़ोतरी घरेलू बजट को प्रभावित करती है। प्याज की कीमतों में मौजूदा तेजी ऐसे समय में सामने आई है जब उपभोक्ता बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को लेकर पहले से सतर्क हैं। यदि आपूर्ति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो त्योहारी मांग बढ़ने के साथ कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका भी पैदा हो सकती है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल प्याज का भाव घटाने की नहीं, बल्कि उत्पादन से लेकर भंडारण और खुदरा बिक्री तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला को संतुलित रखने की है।