नई दिल्ली. राजनाथ सिंह 21 अप्रैल को जर्मनी के महत्वपूर्ण दौरे पर जा रहे हैं, जहां भारत और जर्मनी के बीच लगभग 80 हजार करोड़ रुपये की बड़ी रक्षा डील पर चर्चा हो सकती है। यह डील भारतीय नौसेना के लिए अत्याधुनिक पनडुब्बियों के निर्माण से जुड़ी है, जो आने वाले समय में देश की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती देगी।
क्या है प्रोजेक्ट-75I
प्रोजेक्ट-75I भारतीय नौसेना का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य देश की पनडुब्बी क्षमता को आधुनिक बनाना है। इस परियोजना के तहत छह उन्नत डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा। इस कार्यक्रम में जर्मनी की प्रमुख रक्षा कंपनी थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम तकनीकी सहयोग प्रदान करेगी, जिससे भारत को उन्नत तकनीक हासिल होगी।
पनडुब्बियों की खास तकनीक
इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी विशेषता ‘एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन’ (AIP) प्रणाली है। यह तकनीक पनडुब्बियों को बिना सतह पर आए लंबे समय तक पानी के भीतर संचालित रहने में सक्षम बनाती है। पारंपरिक पनडुब्बियों को हर एक-दो दिन में सतह पर आना पड़ता है, जबकि AIP तकनीक से लैस पनडुब्बियां हफ्तों तक छिपी रह सकती हैं, जिससे उनकी रणनीतिक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
अत्याधुनिक हथियारों से लैस होंगी पनडुब्बिया
प्रोजेक्ट-75I के तहत बनने वाली पनडुब्बियां आधुनिक टॉरपीडो और ब्रह्मोस जैसी एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों से सुसज्जित होंगी। यह हथियार दुश्मन के जहाजों और तटीय ठिकानों पर सटीक और प्रभावी हमला करने में सक्षम होंगे। इससे भारतीय नौसेना को सामरिक बढ़त मिलेगी, विशेषकर हिंद महासागर क्षेत्र में।
चीन की चुनौती से निपटने में मदद
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सामरिक गतिविधियों के बीच यह परियोजना भारत के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। इन पनडुब्बियों के शामिल होने से भारत समुद्री क्षेत्र में अपनी निगरानी और जवाबी क्षमता को मजबूत कर सकेगा, जिससे किसी भी बाहरी खतरे का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सकेगा।
जर्मन तकनीक से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा
इस परियोजना के तहत जर्मनी से मिलने वाली तकनीक भारत के लिए दीर्घकालिक रूप से बेहद फायदेमंद साबित होगी। इससे भारत भविष्य में स्वयं उन्नत पनडुब्बियों के निर्माण में सक्षम बन सकेगा। यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी मजबूती प्रदान करेगी और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ाएगी।
प्रोजेक्ट-75I केवल एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि भारत की समुद्री शक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल देश की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता का मार्ग भी प्रशस्त होगा।