भारतीय वायुसेना बीते कई वर्षों से स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है, जिससे उसकी परिचालन क्षमता पर असर पड़ रहा है। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। रक्षा मंत्रालय की स्वीकृति के बाद इस प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। मंजूरी मिलने पर यह सौदा भारत के सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी रक्षा डील बन सकता है।
डील की अनुमानित लागत और उत्पादन मॉडल
इस संभावित रक्षा सौदे की कुल लागत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये आंकी जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, योजना यह है कि कुल विमानों में से करीब 80 प्रतिशत का निर्माण भारत में ही किया जाए। शुरुआती चरण में 12 से 18 विमान पूरी तरह तैयार अवस्था में फ्रांस से भारत लाए जाएंगे, जबकि शेष विमानों का निर्माण देश में चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।
भारत में दसॉल्ट एविएशन की मौजूदगी
राफेल बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट एविएशन इस परियोजना के तहत भारत में अपनी उत्पादन और तकनीकी सुविधाएं स्थापित कर सकती है। इससे न केवल रक्षा क्षेत्र में तकनीकी हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि घरेलू एयरोस्पेस उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। भारत और फ्रांस के बीच फिलहाल कीमत और अन्य शर्तों को लेकर बातचीत चल रही है। माना जा रहा है कि सौदे की कीमत 2016 की राफेल डील को आधार मानकर तय की जाएगी, जिसमें हर वर्ष औसतन चार प्रतिशत महंगाई दर जोड़ी जा सकती है।
मेंटेनेंस और सर्विस क्षमता में बड़ा सुधार
इस डील का एक अहम पहलू भारत में राफेल विमानों के लिए मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा की स्थापना है। इससे विमानों की उपलब्धता और ऑपरेशनल रेडीनेस में उल्लेखनीय सुधार होगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राफेल की सर्विसेबिलिटी दर करीब 90 प्रतिशत है, जो इसे दुनिया के सबसे भरोसेमंद लड़ाकू विमानों में शामिल करती है।
युद्ध में परखा हुआ और भरोसेमंद प्लेटफॉर्म
राफेल लड़ाकू विमान को कई वास्तविक युद्ध अभियानों में इस्तेमाल किया जा चुका है। कंपनी का दावा है कि लगभग 15 वर्षों की सेवा अवधि में राफेल को किसी भी देश में न तो दुश्मन ने मार गिराया है और न ही यह किसी बड़ी तकनीकी दुर्घटना का शिकार हुआ है। इसी मजबूत रिकॉर्ड के कारण भारतीय वायुसेना ने इसे अन्य विकल्पों की तुलना में अधिक उपयुक्त माना है।
मेक इन इंडिया और रोजगार को मिलेगा बल
सरकार इस डील के जरिए अधिकतम कल-पुर्जों का निर्माण भारत में कराने पर जोर दे रही है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई गति मिलेगी और देश में रक्षा विनिर्माण इकोसिस्टम मजबूत होगा। इसके साथ ही हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी पैदा होने की संभावना है, जिससे आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती मिलेगी।
Comments (0)