कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार की चुप्पी को न सिर्फ अनुचित बताया, बल्कि इसे एक बड़े कूटनीतिक विचलन के रूप में भी प्रस्तुत किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इतनी गंभीर अंतरराष्ट्रीय घटना पर सरकार का शांत रहना वैश्विक संकेतों को गलत दिशा दे सकता है। उनके अनुसार किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कोई सामान्य घटना नहीं है और भारत का मौन इसे चुपचाप स्वीकार करने जैसा संदेश भेजता है।
‘सरकार की चुप्पी तटस्थता नहीं, कर्तव्यहीनता’
सोनिया गांधी ने संसद से लेकर सार्वजनिक विमर्श तक सरकार के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि विश्व राजनीति के संवेदनशील दौर में भारत को स्पष्ट और नैतिक रूप से मजबूत रुख अपनाना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री द्वारा मात्र औपचारिक चिंता जताना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इससे पहले की घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया न देना मूल सवाल उठाता है।
विदेश नीति की दिशा पर गंभीर शंकाएँ
सोनिया गांधी ने भारत की विदेश नीति के चरित्र और संतुलन पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि जब किसी बड़े वैश्विक नेता की हत्या पर भारत अंतरराष्ट्रीय कानून या राष्ट्रों की संप्रभुता का पक्ष नहीं लेता, तो इससे यह संदेश जाता है कि भारत अब नैतिक नेतृत्व की अपनी पारंपरिक भूमिका से दूर जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति भविष्य में भारत की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है।
पीएम के इजरायल दौरे को भी बनाया निशाना
सोनिया गांधी ने खामेनेई पर हमले से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस समय दुनिया भर में गाजा संघर्ष को लेकर रोष है, ऐसे समय में इजरायल सरकार को खुला राजनीतिक समर्थन देना भारत के स्थापित सिद्धांतों से अलग पड़ता है। उनके मुताबिक यह विदेश नीति में एक “परेशान करने वाला बदलाव” है।
क्या विदेश नीति में नए समीकरण बन रहे हैं?
सोनिया गांधी ने कहा कि दुनिया के कई बड़े देश—ग्लोबल साउथ, रूस, चीन, BRICS पार्टनर्स—इस विवाद से दूरी बनाए हुए हैं, जबकि भारत का रुख इसके बिलकुल विपरीत दिखाई दे रहा है। उन्होंने इसे भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति के लिए खतरा बताया और केंद्र से अधिक पारदर्शिता की माँग की।
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