सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में गृहिणियों के अवैतनिक घरेलू श्रम को आर्थिक और सामाजिक रूप से मान्यता देते हुए उन्हें केवल “होममेकर” नहीं, बल्कि “नेशन बिल्डर” के रूप में परिभाषित किया है। अदालत ने कहा कि गृहिणियों का योगदान केवल परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण और मानव संसाधन विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मुआवजा निर्धारण के लिए नए दिशानिर्देश जारी
जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने दुर्घटना पीड़ित गृहिणियों के मामलों में मुआवजा तय करने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने “घरेलू देखभाल के नुकसान” का आर्थिक मूल्य 30,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया है।
घरेलू कार्य को आर्थिक मूल्य देने पर जोर
अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी और गृहिणी द्वारा किए जाने वाले घरेलू कार्य—जैसे बच्चों का पालन-पोषण, भोजन बनाना, सफाई, बुजुर्गों की देखभाल और परिवार का प्रबंधन—एक पूर्णकालिक 24 घंटे की सेवा है। इसे केवल भावनात्मक योगदान मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मोटर दुर्घटना मामलों में लागू होगा नया सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह नया सिद्धांत पहले के मुआवजा मानकों के अतिरिक्त होगा और अब सभी मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में इसे लागू किया जाएगा। अदालत ने उच्च न्यायालयों से इन मामलों की नियमित निगरानी करने की भी अपील की है ताकि पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय मिल सके।
एमवी एक्ट के तहत तेज न्याय प्रक्रिया पर जोर
कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 169 के तहत “संक्षिप्त प्रक्रिया” का सख्ती से पालन करने पर बल दिया है, जिससे मामलों का निपटारा तेजी से हो सके।
गृहिणियों के योगदान को मिली नई पहचान
यह फैसला उन लाखों गृहिणियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनके घरेलू श्रम को अब तक आर्थिक रूप से पर्याप्त मान्यता नहीं मिल पाई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से समाज में उनके योगदान को नई पहचान और सम्मान मिलने की उम्मीद है।