नई दिल्ली. देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हट जाना अपने-आप उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त होने का आधार नहीं बन सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग की भूमिका मतदाता सूची के प्रबंधन तक सीमित है और नागरिकता निर्धारित करने का संवैधानिक अधिकार उसके पास नहीं है। अदालत की इस टिप्पणी को नागरिकता और मतदान अधिकारों के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान हुई टिप्पणी
यह टिप्पणी उस दौरान आई जब सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए गए लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित किए जाने के आरोपों से संबंधित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की जांच करने पर सहमति जताई। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है, तो इसका स्वतः यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि वह सरकारी योजनाओं का पात्र नहीं रहेगा या उसकी नागरिकता समाप्त हो गई है।
चुनाव आयोग की सीमित भूमिका पर अदालत का स्पष्ट रुख
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 9, 10 और 11 के तहत नागरिकता से जुड़े मामलों में चुनाव आयोग कोई संवैधानिक प्राधिकारी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने का निर्णय ले सकता है, लेकिन इससे किसी व्यक्ति की नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं होती। अदालत ने दोहराया कि नागरिकता का निर्धारण संबंधित कानूनों और सक्षम प्राधिकरणों के माध्यम से ही किया जा सकता है।
गृह मंत्रालय को सूचना भेजने की जिम्मेदारी भी बताई
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकता अधिनियम के तहत आवश्यक प्रक्रिया के लिए संबंधित मामला गृह मंत्रालय को भेजे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक कानून के अनुसार निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं होती और सक्षम प्राधिकारी कोई अंतिम निर्णय नहीं लेता, तब तक संबंधित व्यक्ति का नागरिक के रूप में दर्जा स्वतः समाप्त नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण कानूनी मार्गदर्शन मानी जा रही है।
लाखों लंबित अपीलों का भी उठा मुद्दा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित बड़ी संख्या में अपीलें अभी भी लंबित हैं। उन्होंने अदालत के समक्ष कहा कि अपीलीय अधिकरणों के सामने लगभग 34 लाख अपीलें विचाराधीन हैं, जबकि अब तक केवल लगभग 38 हजार मामलों का निपटारा हो पाया है। उनके अनुसार, जिन मामलों का निर्णय हुआ उनमें लगभग 70 प्रतिशत अपीलों को स्वीकार किया गया है, जबकि अधिकांश मामले अब भी लंबित हैं। इस स्थिति को देखते हुए अदालत ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया।
नागरिकता और मतदान अधिकार के बीच कानूनी अंतर हुआ स्पष्ट
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची में नाम होना और नागरिकता का दर्जा दो अलग-अलग कानूनी विषय हैं। मतदान का अधिकार मतदाता सूची में नाम दर्ज होने पर निर्भर करता है, जबकि नागरिकता का निर्धारण संविधान और नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शीर्ष अदालत का यह स्पष्टीकरण भविष्य में ऐसे विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामलों में कानूनी स्पष्टता प्रदान करेगा। अब इस मामले में आगे की सुनवाई और न्यायालय के विस्तृत निर्देशों पर सभी की नजर रहेगी।