कोलकाता. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर उभरा यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता और पार्टी के मुख्य सचेतक की नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों पर केंद्रित है। आरोप है कि विधानसभा में जमा किए गए कुछ आधिकारिक दस्तावेजों पर कई विधायकों के हस्ताक्षर या तो फर्जी तरीके से किए गए या फिर उनकी स्पष्ट सहमति के बिना इस्तेमाल किए गए। इसी वजह से इस पूरे मामले को राजनीतिक गलियारों में ‘सिग्नेचर कांड’ नाम दिया गया है।
दो विधायकों की शिकायत से शुरू हुआ विवाद
विवाद तब तेज हुआ जब टीएमसी के विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय के समर्थन में भेजे गए पत्र में इस्तेमाल किए गए हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए। दोनों विधायकों की शिकायत के बाद मामले ने राजनीतिक रूप ले लिया और जांच की मांग उठने लगी।
सीआईडी जांच और एफआईआर से बढ़ी मुश्किलें
शिकायतों के बाद पश्चिम बंगाल अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) ने मामले की औपचारिक जांच शुरू कर दी। विधानसभा सचिवालय की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराई गई, जिसके बाद जांच एजेंसियों ने संबंधित विधायकों के बयान और नमूना हस्ताक्षर जुटाने शुरू किए। कई विधायकों से पूछताछ की जा चुकी है और जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
पार्टी ने दो विधायकों को किया निष्कासित
मामला उस समय और गंभीर हो गया जब टीएमसी ने शिकायत उठाने वाले दोनों विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर निष्कासित कर दिया। यह कार्रवाई शिकायतों के सार्वजनिक होने के तुरंत बाद हुई, जिससे राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई कि पार्टी के भीतर असंतोष और गुटबाजी पहले से कहीं अधिक गहरी हो चुकी है।
शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची जांच की आंच
विवाद ने नया मोड़ तब लिया जब टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को भी जांच के सिलसिले में पूछताछ के लिए बुलाए जाने की खबर सामने आई। इससे मामला सीधे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच गया और विपक्ष को सरकार तथा पार्टी नेतृत्व पर निशाना साधने का मौका मिल गया।
ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए नई चुनौती
इस पूरे विवाद को केवल दस्तावेजी गड़बड़ी का मामला नहीं माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी झटके के बाद पार्टी के भीतर उभर रहे मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। लंबे समय से मजबूत संगठनात्मक नियंत्रण के लिए पहचानी जाने वाली टीएमसी के लिए यह विवाद अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और आंतरिक एकजुटता की बड़ी परीक्षा बन गया है।
आगे क्या होगा?
सीआईडी जांच के नतीजे इस मामले की दिशा तय करेंगे। यदि हस्ताक्षरों में गड़बड़ी के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल कानूनी मामला नहीं रहेगा, बल्कि टीएमसी की राजनीतिक साख और संगठनात्मक विश्वसनीयता पर भी बड़ा असर डाल सकता है। ऐसे समय में जब पार्टी चुनावी पराजय के बाद खुद को पुनर्गठित करने की कोशिश कर रही है, ‘सिग्नेचर कांड’ उसके सामने एक नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।