कोलकाता: कोलकाता की पहचान सिर्फ दुर्गा पूजा के भव्य आयोजनों से नहीं, बल्कि यहां मौजूद सदियों पुराने मंदिरों और परंपराओं से भी जुड़ी है। शहर में बारोयारी पूजा से लेकर बड़े-बड़े पुराने घरानों की दुर्गा पूजा तक होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कोलकाता की सबसे पुरानी दुर्गा के रूप में किस देवी को जाना जाता है? मान्यता के मुताबिक, कोलकाता की पहली दुर्गा चित्तेश्वरी देवी हैं, जिनका प्राचीन मंदिर चितपुर इलाके में स्थित है। पीले रंग के इस मंदिर से जुड़ी कहानी में डाकू, तंत्र साधना, जंगल, गंगा और करीब साढ़े पांच सौ साल पुरानी मूर्ति का इतिहास मिलता है।
चितपुर में विराजती हैं कोलकाता की पहली दुर्गा
चित्तेश्वरी देवी को आम बोलचाल में चित्रेश्वरी या चित्तेश्वरी कहा जाता है। मान्यता है कि यही वह देवी हैं जिन्हें कोलकाता की सबसे पुरानी दुर्गा माना जाता है। उनका मंदिर चितपुर में गंगा के पास स्थित है। मंदिर की सबसे खास बात यहां स्थापित देवी की प्राचीन काष्ठ की मूर्ति है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना चित्तेश्वर यानी चिते डाकू ने की थी। बंगाल के पुराने इतिहास और लोककथाओं में चिते डाकू का जिक्र मिलता है। योगींद्रनाथ गुप्त की पुस्तक ‘बांग्लार डाकात’ में चिते डाकू को रघु डाकू का पूर्वज बताया गया है। हालांकि, मंदिर से जुड़ी कई बातें लोकमान्यताओं और पुराने लेखों पर आधारित हैं।
चिते डाकू से जुड़ी है मंदिर की कहानी
चित्तेश्वरी मंदिर की कहानी चिते डाकू से गहराई से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि डकैती पर निकलने से पहले चिते डाकू देवी की पूजा करता था। पुराने समय में यहां बलि की प्रथा होने की भी बात कही जाती है। 1846 में ‘कैलकटा रिव्यू’ में रेवरेन्ड लॉन्ग ने इस स्थान का उल्लेख करते हुए इसे चितपुर के काली मंदिर के रूप में बताया था। उनके लेख में यहां बड़ी संख्या में नरबलि दिए जाने का जिक्र मिलता है। इसी वजह से लंबे समय तक कई लोगों को लगता रहा कि चित्तेश्वरी देवी वास्तव में काली हैं। हालांकि, मंदिर की परंपरा और मान्यता के अनुसार यहां विराजमान देवी दुर्गा हैं। चिते डाकू की आराध्य देवी के रूप में भी चित्तेश्वरी दुर्गा का ही उल्लेख मिलता है।
चित्तेश्वरी के नाम से पड़ा चितपुर?
चित्तेश्वरी मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इससे चितपुर इलाके के नाम को लेकर भी एक मान्यता जुड़ी हुई है। कई लोगों का मानना है कि पहले इस इलाके को चित्रपुर कहा जाता था और बाद में यही नाम बदलकर चितपुर हो गया। यानी आज जिस चितपुर कोलकाता का एक महत्वपूर्ण इलाका है, उसके नाम की जड़ें भी इस प्राचीन देवी मंदिर से जुड़ी मानी जाती हैं। हालांकि, इस नाम की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मत भी मिलते हैं।
कहां है चित्तेश्वरी मंदिर?
चित्तेश्वरी मंदिर चितपुर इलाके में गंगा के उस हिस्से के पास स्थित है, जहां नदी अचानक मुड़कर बागबाजार की दिशा में जाती है। वहां से सड़क के रास्ते बीटी रोड की तरफ जाने पर बाईं ओर यह प्राचीन मंदिर दिखाई देता है। मंदिर काशीपुर की गन एंड शेल फैक्ट्री के नंबर-2 गेट के ठीक सामने स्थित बताया जाता है। इसका पता 9 नंबर खगेन्द्र चटर्जी रोड, कोलकाता-700002 है। एक मान्यता यह भी है कि जिस जमीन पर बाद में गन एंड शेल फैक्ट्री बनी, वह कभी चित्तेश्वरी देवी की संपत्ति का हिस्सा थी। इस वजह से मंदिर का इतिहास आसपास के इलाके के विकास से भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
उस समय कोलकाता कैसा था?
आज का कोलकाता उस दौर के कोलकाता से बिल्कुल अलग था। जब चिते डाकू की कहानी सामने आती है, उस समय आज जैसा बड़ा शहर अस्तित्व में नहीं था। भागीरथी नदी के किनारे सुतानुटी, कोलकाता और गोविंदपुर नाम के तीन छोटे गांव थे। चितपुर, शोभाबाजार, बागबाजार और हाटखोला जैसे इलाके सुतानुटी का हिस्सा माने जाते थे। वहीं बड़ाबाजार, धर्मतला और जानबाजार जैसे इलाके कोलकाता गांव में आते थे। हेस्टिंग्स, मैदान और भवानीपुर के इलाके गोविंदपुर का हिस्सा थे। उस समय गंगा के किनारे एक पैदल रास्ता हुआ करता था, जिसे ‘पिलग्रिम रोड’ कहा जाता था। यह रास्ता कालीघाट के काली मंदिर से चितपुर के चित्तेश्वरी मंदिर तक जाता था। तीर्थयात्री इसी रास्ते से गंगा के किनारे यात्रा करते थे।
जंगलों और डाकुओं के बीच था यह इलाका
उस समय चितपुर और आसपास का बड़ा हिस्सा जंगलों से घिरा हुआ था। तीर्थयात्रियों के लिए यह रास्ता आसान नहीं था। बाघों के हमले का खतरा तो था ही, साथ ही डाकुओं का डर भी बना रहता था। इसी इलाके में चिते डाकू का प्रभाव बताया जाता है। लोककथाओं के अनुसार, उसका इस क्षेत्र में काफी दबदबा था। इसी वजह से चित्तेश्वरी मंदिर की कहानी में धार्मिक आस्था के साथ-साथ उस समय के जंगल और डाकुओं से जुड़े किस्से भी मिलते हैं।
करीब साढ़े पांच सौ साल पुरानी है देवी की मूर्ति
चित्तेश्वरी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां मौजूद प्राचीन काष्ठ की मूर्ति है। सुधीरकुमार मित्र ने अपनी पुस्तक ‘देव-देवीर कथा ओ कहानी’ में चिते डाकू की चित्तेश्वरी दुर्गा की दारुमूर्ति यानी लकड़ी की मूर्ति को बंगाल की प्राचीन पुराकृतियों में से एक बताया है। यही वजह है कि इस मूर्ति को सिर्फ धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। करीब साढ़े पांच सौ साल पुरानी मानी जाने वाली यह मूर्ति आज भी आधुनिक कोलकाता के बीच पूजा जा रही है। बिनय घोष ने भी ‘पश्चिम बंगाल की संस्कृति’ में चित्तेश्वरी की प्राचीनता को लेकर लिखा है कि इसे पूरी तरह नकारने का कोई खास कारण नहीं है, हालांकि वर्तमान मंदिर का निर्माण बाद के समय में हुआ हो सकता है।
गंगा से आई नीम की लकड़ी से बनी थी मूर्ति?
मंदिर से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प मान्यता देवी की मूर्ति के निर्माण से जुड़ी है। कहा जाता है कि गंगा में बहकर आए नीम के पेड़ के तने से चिते डाकू ने देवी की मूर्ति तैयार करवाई थी। देवी की मूर्ति का रंग चमकीला पीला बताया जाता है और उनकी आंखें लंबी हैं। मूर्ति के पैरों के नीचे घोड़े के आकार का सिंह और उसके नीचे बाघ की आकृति दिखाई देती है। उस समय यह इलाका जंगलों से घिरा हुआ था। इसलिए बाघ को दक्षिणराय का प्रतीक मानकर मूर्ति में शामिल किए जाने की मान्यता भी मिलती है। देवी की यह अनोखी प्रतिमा मंदिर को दूसरे दुर्गा मंदिरों से अलग पहचान देती है।
1586 में फिर मिली थी देवी की मूर्ति
मान्यता है कि चिते डाकू की मृत्यु के बाद कुछ समय तक चित्तेश्वरी की मूर्ति का कोई पता नहीं था। इसके बाद 1586 में तंत्र साधक नृसिंह ब्रह्मचारी ने इस मूर्ति को खोजा। कहा जाता है कि उस समय वहां होगला के पत्तों से बना एक छोटा मंदिर था। नृसिंह ब्रह्मचारी ने देवी की पूजा दोबारा शुरू की और उनके लिए पंचमुंडी का आसन तैयार किया। इसके बाद धीरे-धीरे इस स्थान की धार्मिक पहचान मजबूत होती चली गई।
गोविंदराम मित्र ने बनवाया मंदिर
समय के साथ चित्तेश्वरी मंदिर का स्वरूप भी बदलता गया। बाद में कोलकाता के प्रसिद्ध जमींदार गोविंदराम मित्र ने यहां दुर्गा मंदिर का निर्माण करवाया। इसके बाद वैवाहिक संबंधों के जरिए इस मंदिर का संबंध साबर्ण राय चौधरी परिवार से भी जुड़ा। इसी परंपरा से जुड़े काशीश्वर राय चौधरी वर्तमान में मंदिर के सेवायत बताए जाते हैं। यानी चित्तेश्वरी मंदिर का इतिहास सिर्फ एक मंदिर की कहानी नहीं है। इसमें प्राचीन बंगाल, कोलकाता के शुरुआती दौर, स्थानीय जमींदार परिवारों, तंत्र साधना और लोक आस्था की कई परतें दिखाई देती हैं।
आज भी धूमधाम से होती है पूजा
इतने लंबे इतिहास के बावजूद चित्तेश्वरी मंदिर में आज भी पूजा की परंपरा जारी है। मंदिर के सेवायत काशीश्वर राय चौधरी के अनुसार, कोलकाता के इस प्राचीन ऐतिहासिक स्थल पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने मंदिर की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है। इसके बावजूद दुर्गा पूजा के दौरान यहां श्रद्धालुओं की आस्था बनी रहती है। इस बार भी मंदिर में धूमधाम से पूजा आयोजित होने की बात कही गई है और भक्तों के लिए मंदिर के द्वार खुले रहेंगे।
इतिहास, आस्था और लोककथा का अनोखा संगम
चित्तेश्वरी मंदिर को लेकर इतिहास और लोकमान्यताओं की कई कहानियां प्रचलित हैं। चिते डाकू से जुड़ी कहानी हो, गंगा से मिली नीम की लकड़ी से मूर्ति बनने की मान्यता हो या फिर करीब साढ़े पांच सौ साल पुरानी प्रतिमा- हर कहानी इस मंदिर को खास बनाती है। आधुनिक कोलकाता की भीड़भाड़ के बीच मौजूद यह मंदिर शहर के उस पुराने दौर की याद दिलाता है, जब यहां जंगल थे, गंगा के किनारे पैदल रास्ते थे और आज के महानगर की जगह छोटे-छोटे गांव बसे हुए थे। यही वजह है कि चित्तेश्वरी को सिर्फ एक देवी मंदिर नहीं, बल्कि कोलकाता के प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।