नई दिल्ली - बच्चों और नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर Meta ने बड़ा कदम उठाने की तैयारी की है। कंपनी की ओर से करीब 18 अरब डॉलर के समझौते के तहत Facebook और Instagram पर नाबालिग यूजर्स की पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित उम्र जांच को मजबूत किया जाएगा। इसके साथ ही 18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने वाले कई उपाय लागू किए जाने की बात सामने आई है।

AI से पता चलेगी यूजर्स की उम्र
नई व्यवस्था के तहत Meta AI तकनीक की मदद से यह पता लगाने की कोशिश करेगा कि कोई यूजर नाबालिग है या नहीं। उम्र को लेकर संदेह होने पर अतिरिक्त वेरिफिकेशन प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसका उद्देश्य कम उम्र के यूजर्स को ऐसे कंटेंट और ऑनलाइन गतिविधियों से बचाना है, जो उनके लिए उपयुक्त नहीं माने जाते।
स्क्रीन टाइम और रात में ऐप इस्तेमाल पर रोक
18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए प्लेटफॉर्म पर स्क्रीन टाइम को सीमित करने और रात के समय ऐप के इस्तेमाल पर प्रतिबंध जैसे उपाय लागू किए जा सकते हैं। इसके अलावा पैरेंटल कंट्रोल को भी मजबूत करने की योजना है, जिससे माता-पिता बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर ज्यादा निगरानी रख सकें। इन उपायों का मकसद बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को ज्यादा सुरक्षित और नियंत्रित बनाना है। खासतौर पर देर रात तक ऐप इस्तेमाल करने और उम्र के हिसाब से अनुपयुक्त कंटेंट तक पहुंच को लेकर चिंता लंबे समय से बनी हुई है।
उम्र सत्यापन से जुड़ी प्राइवेसी की चिंता
हालांकि, बच्चों की सुरक्षा के लिए उठाए जा रहे इन कदमों के साथ प्राइवेसी को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। AI आधारित उम्र सत्यापन में अगर पहचान पत्र या चेहरे से जुड़े डेटा का इस्तेमाल किया जाता है, तो उसके संग्रह, इस्तेमाल और सुरक्षित रखने को लेकर चिंताएं पैदा हो सकती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि संवेदनशील डेटा का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा और इसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा। AI की उम्र पहचानने की सटीकता को लेकर भी सवाल बने हुए हैं, क्योंकि तकनीक से गलत अनुमान लगने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती।
सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन बड़ी चुनौती
Meta के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा बढ़ाने के साथ यूजर्स की निजता को सुरक्षित रखने की है। कंपनी की नई व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होती है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उम्र सत्यापन कितना सटीक है और यूजर्स के संवेदनशील डेटा को किस तरह संभाला जाता है। बच्चों को ऑनलाइन जोखिम से बचाने की कोशिश के बीच यह बहस भी अहम रहेगी कि सुरक्षा के नाम पर तकनीकी निगरानी की सीमा कितनी होनी चाहिए।