ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते असर ने अब धरती की मिट्टी के भीतर बसे उस सूक्ष्म संसार को भी संकट में डाल दिया है, जो फसल उत्पादन और पोषण का मूल आधार माना जाता है। कृषि विज्ञान केंद्रों से प्राप्त हालिया रिपोर्टों से यह तथ्य सामने आया है कि मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों की संख्या लगभग 70% तक घट चुकी है। पहले जहां एक ग्राम उपजाऊ मिट्टी में पाँच करोड़ से अधिक सूक्ष्म जीव पाए जाते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर डेढ़ करोड़ रह गई है। इनका कम होना सीधे तौर पर मिट्टी की उर्वरा क्षमता, फसल की पौष्टिकता और अंततः मानव स्वास्थ्य पर भारी प्रभाव डाल रहा है।
सूक्ष्म जीवों की गिरावट और बढ़ते तापमान का संबंध
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता तापमान मिट्टी के इन सूक्ष्म जीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। ग्लोबल वॉर्मिंग न केवल मिट्टी की नमी छीन रही है, बल्कि उसकी जैविक संरचना को भी कमजोर कर रही है। जैविक खाद की कमी और खेतों में रासायनिक खादों के अत्यधिक प्रयोग ने सूक्ष्म जीवों के संसार को लगभग नष्ट कर दिया है। कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा की जा रही मिट्टी की जांचों में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि मिट्टी के कार्बनिक तत्व 50 वर्ष पहले की तुलना में अब बेहद कम होकर मात्र 0.1–0.2 प्रतिशत रह गए हैं, जबकि पहले यह दो प्रतिशत तक था।
मिट्टी का उर्वरा चक्र क्यों टूट रहा है
सीएसए के वरिष्ठ मृदा वैज्ञानिकों के अनुसार सूक्ष्म जीव मिट्टी के उर्वरा चक्र को सक्रिय रखने वाली वह अदृश्य शक्ति हैं, जिसके बिना फसलें न तो विकसित हो सकती हैं और न ही पौष्टिक रह सकती हैं। यही जीव मिट्टी में मौजूद 18 आवश्यक पोषक तत्वों को सक्रिय करते हैं और पौधों की जड़ों तक पहुँचाते हैं। इनके घटने से मिट्टी का जैविक तंत्र कमजोर होता जा रहा है। फलस्वरूप फसलों में पोषण की कमी बढ़ रही है, जिसका प्रभाव मानव स्वास्थ्य तक पहुँच रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह एक धीमी लेकिन खतरनाक कड़ी है, जो भोजन की थाली में कुपोषण का सबसे बड़ा कारण बन सकती है।
फसलों की पौष्टिकता बचाने के लिए क्या करें किसान
मृदा जांचों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल मुख्य पोषक तत्व ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म जीव भी तेजी से कम हुए हैं। इसलिए कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को गोबर की खाद, हरी खाद, जैविक खाद और केंचुआ खाद के अधिकाधिक उपयोग के लिए प्रेरित कर रहे हैं। साथ ही फसलों के अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में ही सड़ने देने की सलाह दी जा रही है, जिससे मिट्टी का कार्बनिक तत्व बढ़ता है और सूक्ष्म जीवों की संख्या स्वाभाविक रूप से पुनर्जीवित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक पद्धतियों की ओर लौटना ही मिट्टी की पौष्टिकता बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।
सूक्ष्म जीव: मिट्टी के अदृश्य रक्षक क्यों?
सूक्ष्म जीव मिट्टी में पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं और कार्बनिक पदार्थों को अपघटित कर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम और सल्फर जैसे पोषक तत्व पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं। यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कवक के धागे मिट्टी को बांधकर उसके छिद्रयुक्त ढांचे को मजबूत करते हैं, जिससे जलधारण क्षमता बढ़ती है। ये पौधों को रोगों से बचाते हैं और मिट्टी की जैविक सुरक्षा को बनाए रखते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि सूक्ष्म जीव लगातार घटते रहे तो आने वाले वर्षों में खाद्यान्न की गुणवत्ता और उत्पादकता दोनों पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
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