हैदराबाद के प्रसिद्ध बालापुर गणेश उत्सव में इस साल 21 किलो के ऐतिहासिक लड्डू ने नीलामी के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। रियल एस्टेट कंपनी के प्रमुख समा प्रणीत रेड्डी ने 39 लाख रुपये की सबसे बड़ी बोली लगाकर इस प्रतिष्ठित प्रसाद को अपने नाम किया। साल 1994 में मात्र 450 रुपये से शुरू हुई यह परंपरा अब देश भर में आकर्षण का बड़ा केंद्र बन चुकी है। हैदराबाद का नाम लेते ही बिरयानी और चारमीनार दिमाग में आते हैं लेकिन गणेश उत्सव के मौसम में जिस चीज का सबसे बड़ा हाइप होता है वह है बालापुर का यह आइकॉनिक लड्डू। इस साल 21 किलो के प्रसाद ने इंटरनेट और शहरभर में ऐसा तहलका मचाया कि हर कोई बस इसी की बात कर रहा है।
रियल एस्टेट प्रमुख की रिकॉर्ड बोली
इस साल की इस हाई-वोल्टेज नीलामी में असली ट्विस्ट तब आया जब वनाथलीपुरम के साहेब नगर के रहने वाले और एक रियल एस्टेट कंपनी के हेड समा प्रणीत रेड्डी ने सारे रिकॉर्ड्स को हवा में उड़ा दिया। पिछले साल यह लड्डू 35 लाख में बिका था लेकिन इस बार प्रणीत रेड्डी ने 4 लाख रुपये ऊपर यानी सीधे 39 लाख रुपये की भारी-भरकम बोली लगाकर इसे अपने नाम कर लिया। जैसे ही उनका नाम विनर के तौर पर अनाउंस हुआ सोशल मीडिया से लेकर मैदान तक बस उन्हीं के जलवे की चर्चा होने लगी। बप्पा के आशीर्वाद के साथ-साथ उनके साथ तगड़ा स्टेटस सिंबल भी जुड़ गया। बड़े-बड़े सूरमा और एनआरआई आपस में भिड़े तो माहौल एकदम किसी ब्लॉकबस्टर थ्रिलर के क्लाइमैक्स जैसा हो गया।
450 रुपये से शुरू हुई परंपरा
जिस लड्डू के लिए आज लोग लाखों लुटाने को तैयार रहते हैं उसकी शुरुआत एकदम साधारण तरीके से हुई थी। साल 1994 में जब बालापुर गणेश उत्सव समिति ने इस ऑक्शन की शुरुआत की थी तब यह मात्र 450 रुपये में बिका था। पहले विजेता एक स्थानीय किसान कोलानू मोहन रेड्डी थे जो प्रसाद का कुछ हिस्सा अपनी खेती में बरकत के लिए छिड़कने ले गए थे। शुरुआत के 15 साल तो सिर्फ लोकल लोग ही इसमें हिस्सा ले सकते थे लेकिन धीरे-धीरे इसकी पापुलैरिटी इतनी ग्लोबल हो गई कि साल 2009 में सरिता नाम की महिला ने पहली बार बाहर से आकर इसे 5.10 लाख में जीता और इस गेम को पूरी तरह बदल दिया। आज यह परंपरा आस्था और सामाजिक कल्याण दोनों का प्रतीक बन गई है।
आस्था और सामुदायिक कल्याण का संगम
यह सिर्फ एक करोड़पति की बोली या शो-ऑफ नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत ही सॉलिड और पॉजिटिव वजह है। बालापुर गणेश उत्सव समिति इस महा-नीलामी से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल शहर के सामुदायिक विकास और तमाम कल्याणकारी कामों के लिए करती है। यानी एक तरफ जहां बप्पा के इस प्रसाद को पाने के लिए लोग जी-जान लगा देते हैं वहीं दूसरी तरफ इससे मिलने वाला पैसा समाज की भलाई में काम आता है। कोरोना काल के दौरान साल 2020 में जब ऑक्शन नहीं हुआ था तब इसे तत्कालीन सीएम को दिया गया था लेकिन उसके बाद से इसका क्रेज और भी ज्यादा बढ़ चुका है। आस्था के साथ सामाजिक जिम्मेदारी का यह संयोजन अनोखा है।
बढ़ता आकर्षण और भविष्य
बालापुर गणेश लड्डू की नीलामी अब सिर्फ स्थानीय आयोजन नहीं रह गई है बल्कि देशभर के धनाढ्य वर्ग और एनआरआई के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है। हर साल बोली का आंकड़ा बढ़ना आस्था और स्टेटस दोनों को दर्शाता है। समिति द्वारा फंड का उपयोग कल्याण कार्यों में किए जाने से यह परंपरा सार्थक बनी हुई है। 21 किलो के इस प्रसाद को घर ले जाने की दीवानगी रईसों में गजब की है। आने वाले वर्षों में भी यह नीलामी हैदराबाद के गणेश उत्सव की सबसे चर्चित घटना बनी रहेगी और आस्था के साथ सामाजिक विकास का माध्यम बनी रहेगी।