कोलकाता: भाजपा नेता और विधायक अग्निमित्रा पॉल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश और विस्तृत पोस्ट साझा कर ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित किया। वीडियो में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के साथ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक दृश्यों को दिखाया गया है, जिनमें रैलियां, जुलूस, श्रमिकों और सैनिकों से जुड़े दृश्य शामिल हैं। अग्निमित्रा पॉल ने अपने संदेश में कहा कि ‘वंदे मातरम्’ महज दो शब्द या एक गीत नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना, आत्मसम्मान, देशभक्ति और प्रेरणा का प्रतीक है।
बंकिमचंद्र से ‘आनंदमठ’ तक पहुंची आवाज
अग्निमित्रा पॉल ने अपने पोस्ट में ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना बताया। उन्होंने कहा कि यह रचना बाद में बंकिमचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बनी। उपन्यास में मातृभूमि को मां और देवी के रूप में प्रस्तुत करते हुए उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य के वैभव की कल्पना की गई है।
स्वदेशी आंदोलन में बना प्रतिरोध का प्रतीक
अग्निमित्रा पॉल ने विशेष रूप से 1905 के बंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन का उल्लेख किया। उनके अनुसार, ब्रिटिश शासन के खिलाफ विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने के आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ एक प्रमुख उद्घोष बन गया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रिटिश दमन के बावजूद यह नारा आंदोलनों, सभाओं और विरोध प्रदर्शनों में लगातार गूंजता रहा। उन्होंने बारिशाल आंदोलन, लाहौर के विरोध प्रदर्शनों, तूतुकुड़ी के श्रमिक आंदोलन और लोकमान्य तिलक से जुड़े आंदोलनों का भी संदर्भ दिया।
सेलुलर जेल में भी बना साहस का प्रतीक
अग्निमित्रा पॉल ने अंडमान की सेलुलर जेल और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा झेले गए अत्याचारों का जिक्र करते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी देशभक्तों के बीच ‘वंदे मातरम्’ साहस और संघर्ष की भावना जगाता रहा। उनके अनुसार, ब्रिटिश शासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद इस उद्घोष को स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज से पूरी तरह दबाया नहीं जा सका।
मैडम भीकाजी कामा और विदेशों तक पहुंची गूंज
वीडियो संदेश में ‘वंदे मातरम्’ के अंतरराष्ट्रीय संदर्भ का भी उल्लेख किया गया। अग्निमित्रा पॉल ने मैडम भीकाजी कामा का जिक्र करते हुए कहा कि 1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में भारत का ध्वज फहराने के दौरान उसमें ‘वंदे मातरम्’ अंकित था। उन्होंने विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों और उनके प्रकाशनों का भी उल्लेख किया, जिनके जरिए यह नाम और संदेश भारत की आजादी की लड़ाई से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा।
1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने गाया
अग्निमित्रा पॉल ने अपने संदेश में 1896 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इसी अवसर पर रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘वंदे मातरम्’ को स्वर देकर प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह रचना धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति से गहराई से जुड़ गई।
1950 में मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा
पोस्ट में उन्होंने 24 जनवरी 1950 की घटना का भी उल्लेख किया, जब संविधान सभा में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी गई। अग्निमित्रा पॉल ने अपने संदेश में इसे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रतीक बताया।
“वंदे मातरम् में मातृभूमि के प्रति प्रेम”
अपने सोशल मीडिया संदेश में भाजपा नेता ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का भाव अपनी मातृभूमि की वंदना से जुड़ा है। उनके मुताबिक, इन शब्दों में भारत की मिट्टी, प्रकृति, संस्कृति और देश के प्रति गहरा प्रेम समाहित है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और संघर्ष की स्मृतियां आज भी इस उद्घोष के साथ जुड़ी हुई हैं।
सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दिया राष्ट्रीय चेतना का संदेश
अग्निमित्रा पॉल का यह वीडियो संदेश ऐसे समय में सामने आया है, जब ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक भूमिका और राष्ट्रीय महत्व को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श जारी है। अपने संदेश के जरिए उन्होंने युवा पीढ़ी से स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और देश के राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़ी विरासत को समझने और याद रखने की अपील की। उनका मुख्य संदेश यही रहा कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक ऐतिहासिक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, आत्मसम्मान और राष्ट्रभक्ति की लंबी विरासत से जुड़ा एक शक्तिशाली प्रतीक है।