कोलकाता: पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, कोलकाता की सड़कों से निजी बसें गायब होने लगी हैं। चुनाव कर्मियों और केंद्रीय सुरक्षा बलों (Central Forces) की आवाजाही के लिए पुलिस और परिवहन विभाग द्वारा बड़े पैमाने पर निजी बसों का 'अधिग्रहण' (Requisition) किया जा रहा है, जिसका सीधा असर आम यात्रियों पर पड़ रहा है।
प्रमुख बिंदु: क्यों ठप हुई शहर की रफ्तार?
बसों की कमी: 'जॉइंट काउंसिल ऑफ बस सिंडिकेट' के अनुसार, पुलिस ने अब तक लगभग 1600 बसें और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) ने 400 बसें अपने कब्जे में ली हैं।
सरकारी बसों का बुरा हाल: सरकारी बसें भी राहत देने में नाकाम हैं। रखरखाव के अभाव में लगभग 400 सरकारी बसें डिपो में बैठी हैं।
मनमानी का आरोप: बस संगठनों का आरोप है कि पुलिस चलती बसों को रोककर यात्रियों को उतार रही है और वाहन ले जा रही है।
इन रूटों पर सबसे ज्यादा असर
अधिग्रहण के कारण शहर के कई महत्वपूर्ण रूट पूरी तरह ठप होने की कगार पर हैं:
रूट नंबर / नाम | स्थिति
रूट 259 (आकरा फाटक-हावड़ा) कुल 25 बसों में से सभी का अधिग्रहण कर लिया गया है। |
बाटानगर-हावड़ा अधिकांश बसें पुलिस के पास। |
नागेरबाजार-हावड़ा 35 बसों में से गिने-चुने वाहन ही सड़क पर। |
पाटुली-एयरपोर्ट यात्रियों के लिए बस सेवा लगभग शून्य। |
"रोटेशन सिस्टम लागू हो" - बस मालिकों की मांग
सिटी सबअर्बन बस सर्विस ने परिवहन सचिव को पत्र लिखकर इस 'अघोषित अधिग्रहण' को अनैतिक बताया है। संगठन के महासचिव तपन बनर्जी का कहना है:
"चुनाव के लिए बसें लेना जरूरी है, लेकिन कम से कम 30 से 40 प्रतिशत बसें हर रूट पर चालू रहनी चाहिए। पुलिस जिस तरह से बसें उठा रही है, उससे शहर पूरी तरह ठप हो जाएगा। हमारी मांग है कि रूट कमेटी से बात कर रोटेशन पद्धति से बसें ली जाएं।"
प्रशासन का पक्ष
परिवहन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि निर्वाचन आयोग (Election Commission) के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। केंद्रीय बलों की आवाजाही के लिए निजी बसों पर निर्भरता मजबूरी है। हालांकि, विभाग ने आश्वासन दिया है कि वे कोशिश करेंगे कि किसी भी एक रूट की सभी बसें एक साथ न हटाई जाएं ताकि आम जनता को कम से कम परेशानी हो।