अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एशिया और प्रशांत विभाग के निदेशक कृष्णा श्रीनिवासन ने कहा कि पिछले साल रुपये की वास्तविक व्यवस्था को ‘स्थिर’ से ‘क्रॉल-लाइक’ के रूप में पुनर्वर्गीकृत किए जाने के बाद विनिमय दर में काफी ज्यादा लचीलापन आया है। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में कहा कि विनिमय दर को चलने देना बेहतर है। कई एशियाई देशों द्वारा किए गए हस्तक्षेप से ज्यादा राहत नहीं मिली है। आईएमएफ की आर्टिकल IV परामर्श टीम और यांत्रिक अभ्यास का सम्मान करते हुए उन्होंने यह बात कही।
विदेशी मुद्रा दर रक्षा की पहली पंक्ति
श्रीनिवासन ने जोर दिया कि विदेशी मुद्रा दर को अर्थव्यवस्था की रक्षा की पहली पंक्ति के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। विनिमय दर में लचीलापन होने से बाहरी झटकों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। हस्तक्षेप की नीति से सीमित लाभ ही मिलता है। कई एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव से यह साफ है कि केवल हस्तक्षेप पर्याप्त नहीं। बाजार आधारित तंत्र को मजबूत बनाने पर ध्यान देना ज्यादा प्रभावी साबित होता है। रुपये में आए लचीलेपन को सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
जनसांख्यिकीय लाभ के लिए कौशल सुधार जरूरी
श्रीनिवासन ने कहा कि जनसांख्यिकीय लाभांश का पूरा फायदा उठाने के लिए कौशल असंतुलन को दूर करना जरूरी है। युवा बेरोजगारी और श्रम बाजार की चुनौतियों का समाधान कौशल विकास से ही संभव है। एशिया की जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणालियों को मजबूत करना होगा। कौशल और रोजगार की मांग के बीच अंतर को पाटना प्राथमिकता होनी चाहिए। सही नीतियां अपनाकर ही युवा आबादी को आर्थिक विकास का इंजन बनाया जा सकता है।
निर्यात आधारित विनिर्माण मॉडल की चुनौतियां
एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक परिदृश्य में चेतावनी दी गई है कि निर्यात आधारित विनिर्माण मॉडल के जरिए रोजगार पैदा करना अब कठिन होता जा रहा है। वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव और प्रतिस्पर्धा बढ़ने से यह मॉडल पहले जितना प्रभावी नहीं रहा। देशों को नई रणनीतियां अपनानी होंगी। सेवा क्षेत्र और घरेलू मांग पर भी ध्यान देना होगा। कौशल विकास के साथ नवाचार और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देकर रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
श्रम पुनःकौशल का महत्व
श्रीनिवासन ने श्रम पुनःकौशल यानी रीस्किलिंग के महत्व पर विशेष जोर दिया। तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था में पुराने कौशल पर्याप्त नहीं रह गए हैं। कामगारों को नए कौशल सिखाकर उन्हें रोजगार योग्य बनाना होगा। डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने होंगे। सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को मिलकर इस दिशा में काम करना चाहिए। सही रीस्किलिंग से उत्पादकता और आय दोनों बढ़ सकते हैं।
एशिया की जनसांख्यिकीय चुनौतियां और अवसर
एशिया की जनसांख्यिकीय स्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है। युवा आबादी वाले देशों के लिए यह लाभांश का समय है लेकिन कौशल और रोजगार के अवसर नहीं जुटाए गए तो यह बोझ बन सकता है। श्रीनिवासन ने कहा कि नीति निर्माताओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर निवेश बढ़ाना होगा। सही नीतियों से जनसांख्यिकीय लाभ को आर्थिक विकास में बदला जा सकता है। रुपये के लचीलेपन और कौशल सुधार दोनों ही दीर्घकालिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।