नई दिल्ली. भारतीय मुद्रा बाजार में गिरावट का दबाव लगातार गहराता जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया एक बार फिर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे अर्थव्यवस्था और बाजार दोनों में चिंता बढ़ गई है। शुरुआती कारोबार में रुपया 20 पैसे टूटकर 95.86 प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से लगातार गिरावट झेल रही भारतीय मुद्रा अब एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय हालात और ऊर्जा संकट ने रुपये की स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
कच्चे तेल की महंगाई बनी सबसे बड़ी वजह
रुपये पर दबाव बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतें मानी जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण तेल बाजार में भारी अस्थिरता बनी हुई है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब आधी प्राकृतिक गैस विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेज वृद्धि का सीधा असर भारतीय आयात बिल और मुद्रा विनिमय बाजार पर पड़ रहा है।
लगातार तीसरे दिन रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 95.74 प्रति डॉलर पर खुला और कुछ ही समय बाद गिरकर 95.86 तक पहुंच गया। इससे पहले बुधवार को भी रुपया 95.80 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा था और 95.66 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। लगातार तीन कारोबारी सत्रों में नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचना यह संकेत देता है कि बाजार में निवेशकों की चिंता लगातार बढ़ रही है। इस सप्ताह अकेले रुपये में लगभग 1.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बढ़ाया दबाव
विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से लगातार निकासी भी रुपये की कमजोरी का बड़ा कारण बन रही है। वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पूंजी की बिकवाली बढ़ने से डॉलर की मांग और तेज हो गई है। इसका असर सीधे रुपये की विनिमय दर पर दिखाई दे रहा है।
आरबीआई लगातार कर रहा हस्तक्षेप
जानकारों के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए लगातार डॉलर बेचकर बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्रीय बैंक अब तक अरबों डॉलर खर्च कर चुका है, ताकि रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोका जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरबीआई सक्रिय हस्तक्षेप नहीं करता, तो रुपये की स्थिति और अधिक कमजोर हो सकती थी। हालांकि लगातार बढ़ते वैश्विक दबाव के बीच केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती भी बढ़ती जा रही है।
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी वैश्विक बेचैनी
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान से जुड़े हालात ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। इसी कारण निवेशकों की चिंता बढ़ी हुई है और डॉलर को सुरक्षित मुद्रा के रूप में अधिक समर्थन मिल रहा है। मजबूत अमेरिकी डॉलर के कारण अन्य देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है, लेकिन भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर इसका असर और अधिक गंभीर दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें और बढ़ीं, तो भारत का व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा दोनों बढ़ सकते हैं।
महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
रुपये की कमजोरी का असर केवल विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। महंगा आयात होने से पेट्रोल-डीजल, गैस, परिवहन और कई उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई में तेजी आने और आर्थिक गतिविधियों की लागत बढ़ने की आशंका है। आने वाले समय में वैश्विक हालात, तेल बाजार और आरबीआई की रणनीति भारतीय मुद्रा की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।