रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 95.58 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। इस वित्त वर्ष में यह 11% गिर चुका है, जिससे विदेशी सामान महंगा होने की संभावना बढ़ गई है
रुपये में ऐतिहासिक गिरावट
30 मार्च को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 88 पैसे गिरकर 95.22 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। यह लगातार तीसरा दिन है जब रुपये में कमजोरी दर्ज की गई है। पिछले एक महीने में रुपया लगभग 4% गिर चुका है, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में यह 10% से अधिक टूट गया है, जो पिछले 14 वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है।
वैश्विक तनाव और तेल कीमतों का असर
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ा है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर दबाव बढ़ गया है। महंगा तेल रुपये की कमजोरी का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है।
RBI के प्रयास और सीमित प्रभाव
रुपये को संभालने के लिए रिजर्व बैंक ने बैंकों की फॉरेक्स पोजीशन लिमिट को सख्त किया। हालांकि, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के कारण इस कदम का असर बहुत कम समय तक ही देखने को मिला। बाजार में स्थिरता लाने की कोशिशें फिलहाल कमजोर पड़ती नजर आ रही हैं।
शेयर बाजार पर भी दबाव
रुपये की गिरावट और महंगे तेल का असर शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। निफ्टी में करीब 2% की गिरावट दर्ज की गई है और यह मार्च 2020 के बाद अपनी सबसे खराब मासिक गिरावट की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितता और विदेशी निवेश की निकासी भारतीय बाजार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।