मुंबई - बॉलीवुड के कई लोकप्रिय गानों में ऐसे बोल सुनने को मिले हैं, जिन्हें लेकर महिलाओं की आपत्ति रही है। मशहूर प्लेबैक सिंगर श्रेया घोषाल ने अब बताया है कि उन्होंने अपने करियर में कुछ ऐसे गाने गाने से इनकार किया, जो उन्हें आपत्तिजनक लगे। उनके मुताबिक, किसी गाने का मूल्यांकन सिर्फ उसके बोलों से नहीं, बल्कि उसकी कंपोजिशन और उसे पेश करने के तरीके से भी किया जाना चाहिए।

'कुछ लोकप्रिय गाने मैंने गाने से मना कर दिए'
‘द मेल फेमिनिस्ट पॉडकास्ट’ के साथ बातचीत में श्रेया से उन गानों के बारे में सवाल किया गया, जिनके बोल उन्हें ठीक नहीं लगे। उन्होंने कहा कि गीत के शब्द निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पूरी रचना और उसका अंदाज भी मायने रखता है। श्रेया ने बताया कि उनके करियर में कुछ ऐसे गाने भी आए, जो बाद में काफी लोकप्रिय हुए, लेकिन उन्होंने उन्हें गाने से मना कर दिया। हालांकि, उनका मानना है कि अब इस तरह के गानों की संख्या पहले की तुलना में कम हुई है।

'महिला सिंगर्स को एक तरह के गाने मिलने लगे थे'
श्रेया ने म्यूजिक इंडस्ट्री में महिलाओं की भूमिका को लेकर भी अपनी राय रखी। उनके मुताबिक, एक दौर ऐसा था जब फिल्मों में महिला गायिकाओं को सीमित तरह के गाने ही दिए जाते थे। ज्यादातर दूसरे गाने पुरुष गायकों के हिस्से में जाते थे, जबकि महिलाओं के लिए मुख्य रूप से रोमांटिक डुएट रखे जाते थे। उन्होंने इस स्थिति को व्यापक जेंडर और पितृसत्तात्मक सोच से जोड़ते हुए कहा कि इसका असर सिर्फ गायिकाओं पर नहीं, बल्कि अभिनेत्रियों और मनोरंजन उद्योग से जुड़े दूसरे लोगों पर भी पड़ता है।

'म्यूजिक इंडस्ट्री अभी भी पुरुष-प्रधान है'
श्रेया ने कहा कि इंडिपेंडेंट म्यूजिक के बढ़ते प्रभाव से इंडस्ट्री में कुछ बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इसके बावजूद उनका मानना है कि म्यूजिक इंडस्ट्री में अभी भी पुरुषों का दबदबा काफी ज्यादा है। सिंगर ने यह भी कहा कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहले भी खुलकर अपनी बात रखी है और इस बात की ज्यादा चिंता नहीं करतीं कि लोग उनके विचारों को किस नजरिए से देखते हैं।

'चिकनी चमेली' जैसे गानों पर भी कर चुकी हैं बात
श्रेया घोषाल ने 2025 में लिली सिंह के साथ बातचीत के दौरान अपने करियर के कुछ बोल्ड गानों का भी जिक्र किया था। इनमें 'चिकनी चमेली' भी शामिल है। हालांकि, उन्होंने कहा था कि आज के समय में वह शायद इस तरह के गाने नहीं गाएंगी। उन्होंने सेंसेशनल या सेक्सी प्रस्तुति और महिलाओं को पूरी तरह ऑब्जेक्टिफाई करने के बीच अंतर की बात कही थी। उनके मुताबिक, समय के साथ वह इस फर्क को लेकर ज्यादा संवेदनशील और जागरूक हुई हैं।
छोटी बच्चियों को ऐसे गाने गाते देखकर होती है असहजता
श्रेया ने बताया था कि उन्हें सबसे ज्यादा असहज तब महसूस होता है, जब छोटी बच्चियां बिना गानों के अर्थ को समझे उनके बोल गाती हैं या उन पर डांस करती हैं। उन्होंने कहा कि जब पांच-छह साल की बच्चियां उनके पास आकर किसी ऐसे गाने को गाने की बात करती हैं, जिसके बोल वयस्क संदर्भ वाले हैं, तो उन्हें यह स्थिति सही नहीं लगती। इसी अनुभव ने भी उन्हें गानों के बोल और उनके सामाजिक प्रभाव को लेकर ज्यादा सजग बनाया है। श्रेया की बातों से साफ है कि उनके लिए किसी गाने की लोकप्रियता से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके शब्द, प्रस्तुति और समाज पर पड़ने वाला असर है।