सुरैया जमाल शेख का जन्म 15 जून 1929 को लाहौर में हुआ था। बचपन में ही उनका परिवार बंबई आ गया और यहीं उनकी प्रतिभा को वह वातावरण मिला जिसने आगे चलकर उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय गायिका-अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया। बचपन से ही संगीत और अभिनय की ओर उनका आकर्षण था। वह आकाशवाणी के बाल कार्यक्रमों में भी गाती थीं और इसी दौर में उनकी पहचान भविष्य के अनेक फिल्मी कलाकारों से हुई। सिनेमा में उनका प्रवेश बाल कलाकार के रूप में हुआ और धीरे-धीरे उनकी आवाज़ तथा अभिनय दोनों ने निर्माताओं और संगीतकारों का ध्यान आकर्षित करना शुरू किया। 1941 की ताजमहल में उन्होंने मुमताज महल की भूमिका निभाई और इसके बाद उनके लिए फिल्मों की दुनिया के दरवाजे लगातार खुलते चले गए।
बारह साल की उम्र में गायकी की शुरुआत
सुरैया की गायकी की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है जितनी उनकी अभिनय यात्रा। महज 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने फिल्मों के लिए गाना शुरू कर दिया था। संगीतकार नौशाद ने उनकी आवाज़ की संभावनाओं को पहचाना और शुरुआती दौर में उनके गायन को अवसर मिला। उस समय सुरैया को शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं थी लेकिन उनकी स्वाभाविक आवाज़ में मिठास, उच्चारण की स्पष्टता और भावाभिव्यक्ति की ऐसी क्षमता थी जिसने उन्हें अलग पहचान दी। एक प्रसंग के अनुसार शुरुआती रिकॉर्डिंग के दौरान उनकी कम उम्र के कारण उन्हें माइक्रोफोन तक पहुंचने के लिए स्टूल पर खड़ा होना पड़ा था। यही गुण उन्हें अपने दौर की सामान्य अभिनेत्री से अलग बनाता था क्योंकि वह केवल गीत पर होंठ मिलाने वाली नायिका नहीं थीं बल्कि उनके गीतों में उनकी अपनी आवाज़ होती थी।
अनमोल घड़ी से लोकप्रियता के शिखर तक
1946 की अनमोल घड़ी सुरैया के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में रही। इस फिल्म में उन्होंने नूरजहाँ और सुरेंद्र के साथ काम किया। यह वह समय था जब भारतीय सिनेमा में महिला सितारों की लोकप्रियता अपने अलग मुकाम पर थी और सुरैया ने स्वयं को उसी दौर की प्रमुख कलाकारों की कतार में स्थापित किया। इसके बाद विद्या, प्यार की जीत, दिल्लगी और बड़ी बहन जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को और व्यापक बना दिया। 1948 और 1949 का दौर विशेष रूप से उनके लिए महत्वपूर्ण रहा। इन वर्षों में उनकी फिल्मों की सफलता ने उन्हें शीर्ष सितारों में पहुंचा दिया। उस समय उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि वह अपने पुरुष सहकलाकारों से भी अधिक पारिश्रमिक पाने वाली प्रमुख फिल्म हस्तियों में शामिल थीं।
मिर्ज़ा ग़ालिब और अदाकारी का शिखर
यदि सुरैया के लंबे फिल्मी सफर में किसी एक फिल्म को उनकी कलात्मक विरासत का विशेष अध्याय कहा जाए तो वह 1954 की मिर्ज़ा ग़ालिब है। इस फिल्म में उन्होंने मोती बेगम की भूमिका निभाई और अभिनय के साथ अपने गायन से भी फिल्म को विशेष ऊंचाई दी। फिल्म को राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक मिला और सुरैया के अभिनय की व्यापक प्रशंसा हुई। विदेश मंत्रालय के एक पुराने प्रकाशन में भी इस फिल्म को उनके अभिनय और गायन करियर का शिखर बताया गया है तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा उनके अभिनय की प्रशंसा का उल्लेख मिलता है। मिर्ज़ा ग़ालिब में सुरैया ने उर्दू शायरी के भावलोक को अपनी आवाज़ और चेहरे के माध्यम से जिस तरह व्यक्त किया उसने उन्हें अपनी पीढ़ी की विशिष्ट कलाकार बना दिया।
देव आनंद के साथ अधूरी प्रेमकथा और विदाई
सुरैया की जिंदगी का सबसे चर्चित अध्याय उनका और देव आनंद का रिश्ता रहा। दोनों ने जीत, अफसर और अन्य फिल्मों में साथ काम किया और पर्दे पर उनकी जोड़ी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय रही। पर्दे के बाहर भी दोनों के बीच प्रेम संबंध की चर्चा उस समय फिल्म जगत की सबसे चर्चित कहानियों में शामिल थी। लेकिन यह प्रेम विवाह तक नहीं पहुंच सका क्योंकि परिवार की असहमति इसके रास्ते में बड़ी बाधा बनी। सुरैया ने जीवनभर विवाह नहीं किया। 1963 में रुस्तम सोहराब उनकी अंतिम फिल्म बनी और इसके बाद उन्होंने सिनेमा से दूरी बना ली। उस समय उनकी उम्र लगभग 34 वर्ष ही थी। 31 जनवरी 2004 को मुंबई में उनका निधन हुआ जब वह 74 वर्ष की थीं। उनकी आवाज़ और अभिनय आज भी उस युग की याद दिलाते हैं जब एक कलाकार के चेहरे से निकली आवाज़ सीधे श्रोता के दिल तक पहुंचती थी।